Tuesday, April 26, 2011

मौन



योग कहता है कि मौन ध्यान की ऊर्जा और सत्य का द्वार है। मौन से जहाँ मन की मौत हो जाती है वहीं मौन से मन की ‍शक्ति भी बढ़ती है। जिसे मोक्ष के मार्ग पर जाना है वह मन की मौत में विश्वास रखता है और जिसे मन का भरपूर व सही उपयोग करना है वह मन की शक्ति पर विश्वास करेगा। जब तक मन है तब तक सांसारिक उपद्रव है और मन गया कि संसार खत्म और संन्यास शुरू। मौन से कुछ भी घटित हो सकता है। योग में किसी भी क्रिया को करते वक्त मौन का महत्व माना जाता रहा है।


क्यों रहें मौन- हो सकता है कि पिछले 15-20 वर्षों से तुम व्यर्थ की बहस करते रहे हों। वही बातें बार-बार सोचते और दोहराता रहते हो जो कई वर्षों के क्रम में सोचते और दोहराते रहे। क्या मिला उन बहसों से और सोच के अंतहिन दोहराव से? मानसिक ताप, चिंता और ब्लड प्रेशर की शिकायत या डॉयबिटीज का डाँवाडोल होना। योगीजन कहते हैं कि जरा सोचे आपने अपने ‍जीवन में कितना मौन अर्जित किया और कितनी व्यर्थ की बातें।

मौन रहने का तरीका- ऑफिस में काम कर रहे हैं या सड़क पर चल रहे हैं। कहीं भी एक कप चाय पी रहे हैं या अकेले बैठे हैं। किसी का इंतजार कर रहे हैं या किसी के लिए कहीं जा रहे हैं। सभी स्थितियों में व्यक्ति के मन में विचारों की अनवरत श्रृंखला चलती रहती है और विचार भी कोई नए नहीं होते। रोज वहीं विचार और वही बातें जो पिछले कई वर्षों से चलती रही है। 


आप चुपचाप रहने का अभ्यास करें और व्यर्थ की बातों से स्वयं को अलग कर लें। सिर्फ श्वासों के आवागमन पर ही अपना ध्यान लगाए रखें और सामने जो भी दिखाई या सुनाई दे रहा है उसे उसी तरह देंखे जैसे कोई शेर सिंहावलोकन करता है। सोचे बिल्कुल नहीं और कहें कुछ भी नहीं, बल्कि ज्यादा से ज्यादा चुप रहने का अभ्यास करें। साक्षी भाव में रहें अर्था किसी भी रूप में इन्वॉल्व ना हों।



यदि आप ध्यान कर रहे हैं तो आप अपनी श्वासों की आवाज सुनते रहें और उचित होगा कि आसपास का वातावण भी ऐसा हो कि जो आपकी श्वासों की आवाज को सुनने दें। पूर्णत: शांत स्थान पर मौन का मजा लेने वाले जानते हैं कि उस दौरान वे कुछ भी सोचते या समझते नहीं हैं बल्कि सिर्फ हरीभरी प्रकृति को निहारते हैं और स्वयं के अस्तित्व को टटोलते हैं।


अवधि- वैसे तो मौन रहने का समय नियुक्ति नहीं किया जा सकता कहीं भी कभी भी और कितनी भी देर तक मौन रहकर मौन का लाभ पाया जा सकता है। किंतु फिर भी किसी भी नियुक्त समय और स्थान पर रहकर हर दिन ध्यान या मौन 20 मिनट से लेकर 1 घंटे तक किया जा सकता है।

क्या करें मौन में- मौन में सबसे पहले जुबान चुप होती है, लेकिन आप धीरे-धीरे मन को भी चुप करने का प्रयास करें। मन में चुप्पी जब गहराएगी तो आँखें, चेहरा और पूरा शरीर चुप और शांत होने लगेगा। तब इस संसार को नए सिरे से देखना शुरू करें। जैसे एक 2 साल का बच्चा देखता है। जरूरी है कि मौन रहने के दौरान सिर्फ श्वासों के आवागमन को ही महसूस करते हुए उसका आनंद लें।

मौन के लाभ- मौन से मन की शक्ति बढ़ती है। शक्तिशाली मन में किसी भी प्रकार का भय, क्रोध, चिंता और व्यग्रता नहीं रहती। मौन का अभ्यास करने से सभी प्रकार के मानसिक विकार समाप्त हो जाते हैं। रात में नींद अच्छी आती है।


यदि मौन के साथ ध्यान का भी प्रयोग किया जा रहा है तो व्यक्ति निर्मनी दशा अर्थात बगैर मन के जीने वाला बन सकता है इसे ही 'मन की मौत' कहा जाता है जो आध्यात्मिक लाभ के लिए जरूरी है। मन को शां‍त करने के लिए मौन से अच्छा और कोई दूसरा रास्ता नहीं। मन से जागरूकता (होश) का विकास होता है।



मौन से सकारात्मक सोच का विकास होता है। सकारात्मक सोच हमारे अंदर की शक्ति को और मजबूत करती है। ध्यान योग और मौन का निरंतर अभ्यास करने से शरीर की बीमारियों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है।

अस्तेय और अपरिग्रह योग


ND
योग के प्रथम अंग ‍यम के तीसरे और पांचवें उपांग अस्तेय और अपरिग्रह का जीवन में अत्यधिक महत्व है। दोनों को ही साधने से व्यक्ति के व्यक्तित्व में निखार आ जाता है साथ ही वह शारीरिक और मानसिक रोग से स्वत: ही छूट जाता है।

वैज्ञानिक कहते हैं कि 70 प्रतिशत से अधिक रोग व्यक्ति की खराब मानसिकता के कारण होते हैं। योग भी मानता है कि रोगों की उत्पत्ति की शुरुआत मन और मस्तिष्क में ही होती है। यही जानकर योग सर्वप्रथम यम और नियम द्वारा व्यक्ति के मन और मस्तिष्क को ठीक करने की सलाह देता है।

(1) अस्तेय : इसे अचौर्य भी कहते हैं अर्थात चोरी की भावना नहीं रखना, न ही मन में चुराने का विचार लाना। किसी भी व्यक्ति की वस्तु या विचार को चोर कर स्वयं का बनाने या मानने से आपकी खुद की आइडेंटी समाप्त होती है और आप स्वयं अपुरुष कहलाते हैं।

धन, भूमि, संपत्ति, नारी, विद्या, विचार आदि किसी भी ऐसी वस्तु जिसे अपने पुरुषार्थ से अर्जित नहीं किया या किसी ने हमें भेंट या पुरस्कार में नहीं दिया, को लेने के विचार मात्र से ही अस्तेय खंडित होता है। इस भावना से चित्त में जो असर होता है उससे मानसिक प्रगति में बाधा उत्पन्न होती है और मन रोगग्रस्त हो जाता है जिसका हमें पता भी नहीं चलता।

(2) अपरिग्रह : इसे अनासक्ति भी कहते हैं अर्थात किसी भी विचार, वस्तु और व्यक्ति के प्रति मोह न रखना ही अपरिग्रह है। कुछ लोगों में संग्रह करने की प्रवृत्ति होती है, जिससे मन में भी व्यर्थ की बातें या चीजें संग्रहित होने लगती हैं। इससे मन में संकुचन पैदा होता है। इससे कृपणता या कंजूसी का जन्म होता है। आसक्ति से ही आदतों का जन्म भी होता है। मन, वचन और कर्म से इस प्रवृत्ति को त्यागना ही अपरिग्रही होना है।

दोनों के लाभ : यदि आपमें चोरी की भावना नहीं है तो आप स्वयं के विचार अर्जित करेंगे और स्वयं द्वारा अर्जित वस्तु को प्राप्त कर सच्चा संतोष और सुख पाएंगे। यह भाव कि सब कुछ मेरे कर्म द्वारा ही अर्जित है- आपमें आत्मविश्वास का विकास करता है। यह आत्मविश्वास अपको मानसिक रूप से सुदृढ़ बनाता है। मानसिक सुदृढ़ता ही अच्‍छी सेहत और सफलता का आधार है।

किसी भी विचार और वस्तु का संग्रह करने की प्रवृत्ति छोड़ने से व्यक्ति के शरीर से संकुचन हट जाता है जिसके कारण शरीर शांति को महसूस करता है। इससे मन खुला और शांत बनता है। छोड़ने और त्यागने की प्रवृत्ति के चलते मृत्युकाल में शरीर के किसी भी प्रकार के कष्ट नहीं होते। कितनी ही महान वस्तु हो या कितना ही महान विचार हो, लेकिन आपकी आत्मा से महान कुछ भी नहीं।

शौच से सकारात्मक सोच


शौच को अंग्रेजी में Purity कह सकते हैं। अष्टांग योग के दूसरे अंग 'नियम' के उपांगों के अंतर्गत प्रथम 'शौच' का जीवन में बहुत महत्व है। शौच अर्थात शुचिता, शुद्धता, शुद्धि, विशुद्धता, पवित्रता और निर्मलता। शौच का अर्थ शरीर और मन की बाहरी और आंतरिक पवित्रता से है।

शौच का अर्थ मलिनता को बाहर निकालना भी है। शौच के दो प्रकार हैं- बाह्य और आभ्यन्तर। बाह्य का अर्थ बाहरी शुद्धि से है और आभ्यन्तर का अर्थ आंतरिक अर्थात मन वचन और कर्म की शुद्धि से है। जब व्यक्ति शरीर, मन, वचन और कर्म से शुद्ध रहता है तब उसे स्वास्थ्‍य और सकारात्मक ऊर्जा का लाभ मिलना शुरू हो जाता है।

*बाहरी शुद्धि- हमेशा दातुन कर स्नान करना एवं पवित्रता बनाए रखना बाह्य शौच है। कितने भी बीमार हों तो भी मिट्टी, साबुन, पानी से थोड़ी मात्रा में ही सही लेकिन बाहरी पवित्रता अवश्य बनाए रखनी चाहिए। आप चाहे तो शरीर के जो छिद्र हैं उन्हें ही जल से साफ और पवित्र बनाएँ रख सकते हैं। बाहरी शुद्धता के लिए अच्छा और पवित्र जल-भोजन करना भी जरूरी है। अपवित्र या तामसिक खानपान से बाहरी शु‍द्धता भंग होती है।

*आंतरिक शुद्धि- आभ्यन्तर शौच उसे कहते हैं जिसमें हृदय से रोग-द्वेष तथा मन के सभी खोटे कर्म को दूर किया जाता है। जैसे क्रोध से मस्तिष्क और स्नायुतंत्र क्षतिग्रस्त होता है। लालच, ईर्ष्या, कंजूसी आदि से मन में संकुचन पैदा होता है जो शरीर की ग्रंथियों को भी संकुचित कर देता है। यह सभी हमारी सेहत को प्रभावित करते हैं। मन, वचन और कर्म से पवित्र रहना ही आंतरिक शुद्धता के अंतर्गत आता है अर्थात अच्छा सोचे, बोले और करें।

शौच के लाभ- ईर्ष्या, द्वेष, तृष्णा, अभिमान, कुविचार और पंच क्लेश को छोड़ने से दया, क्षमा, नम्रता, स्नेह, मधुर भाषण तथा त्याग का जन्म होता है। इससे मन और शरीर में जाग्रति का जन्म होता है। विचारों में सकारात्मकता बढ़कर उसके असर की क्षमता बढ़ती है। रोग और शौक से छुटकारा मिलता है। शरीर स्वस्थ और सेहतमंद अनुभव करता है। निराशा, हताशा और नकारात्मकता दूर होकर व्यक्ति की कार्यक्षमता बढ़ती है।

  अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'

जपयोग का चमत्कार


शास्त्र अनुसार 'ज' का अर्थ जन्म का रुक जाना और 'प' का अर्थ पाप का नष्ट हो जाना। किसी शब्द या मंत्र को बार-बार उच्चारित करना या मन ही मन दोहराना जपयोग कहलाता है।

इसे मंत्रयोग भी कहते हैं। मंत्र का अर्थ होता है मन को एक तंत्र में बाँधना। जब मन एक तंत्र में बंध जाता है तो व्यक्ति मानसिक रूप से शक्तिशाली बन जाता है। जपयोग सबसे प्राचीनतम योग है और सभी धर्म इस योग का अनुसरण करते हैं। यह एक चमत्कारिक योग है। इसका असर व्यक्ति के मन और मस्तिष्क पर जबरदस्त पड़ता है। जपयोग हर तरह के रोग और शोक को मिटाने की क्षमता रखता है।

जपयोग के तीन प्रकार हैं:- वाचिक, उपांशु और मानस। वाचिक का अर्थ मुँह से स्पष्ट उच्चारण के साथ किया जाने वाला जप। उपांशु का अर्थ मंद स्वर से मुँह के अंदर ही किया जाने वाला जप और मानस अर्थात मन ही मन किए जाने वाला जप।

FILE
कैसे मिटते हैं शोक : जब व्यक्ति बहुत व्यग्र या चिंतित रहता है तो तरह-तरह कनकारात्मक विचारों से घिर जाता है और पहले की अपेक्षा परिस्थितियों को और संकटपूर्ण बना लेता है। ढेर सारे विचारों से बचने के लिए किसी भी मंत्र का जप करते रहने से मन में विश्वास और सकारात्मक ऊर्जा का विकास होता है। इससे शोक और संताप मिट जाता है। यह व्यक्ति को मानसिक रूप से शांत कर देता है।

मानसिक शक्ति बढ़ाता है : अच्छे विचार, मंत्र और भगवान का बार-बार जप करने या ध्यान करते रहने से व्यक्ति की मानसिक शक्ति बढ़ती जाती है। मानसिक शक्ति के बल पर ही व्यक्ति सफल, स्वस्थ और शक्तिशाली महसूस कर सकता है।

ईश्वर और ईथर से जोड़ता जप : अपने ईष्ट या किसी शक्तिशाली मंत्र का निरंतर जप करने से व्यक्ति ईधर माध्यम की सकारात्मक ऊर्जा और शक्तियों से जुड़ जाता है। जपयोग व्यक्ति के अवचेतन को जाग्रत कर उसे दिव्य दृष्टि प्रदान करता है। ऐसा व्यक्ति स्वयं को किसी भी रूप में स्थापित करने में सक्षम हो जाता है। इससे व्यक्ति टेलीपैथिक और परा मनोविज्ञान में पारंगत हो सकता है।

जपयोग के चमत्कार के संबंध में सभी धर्मों के शास्त्रों में ढेर सारे उल्ले‍ख मिलते हैं। वेदों में विभिन्न प्रकार के मंत्रों का प्रयोग किया गया है। इनमें प्रयोग किए जाने वाले मंत्रों में अत्यंत शक्ति होती है, क्योंकि इन मंत्रों को पढ़ने से जो ध्वनि तरंग उत्पन्न होती है, उससे शरीर के स्थूल व सूक्ष्म अंग तक कंपित होते हैं।

अनेक परिक्षणों से यह सिद्ध हो गया है कि मंत्रों में प्रयोग होने वाले शब्दों में भी शक्ति होती है। मंत्रों में प्रयोग होने वाले कुछ ऐसे शब्द हैं, जिन्हे 'अल्फा वेव्स' कहते हैं। मंत्र का यह शब्द 8 से 13 साइकल प्रति सैंकेंड में होता है और यह ध्वनि तरंग व्यक्ति की एकाग्रता में भी उत्पन्न होती है। इन शब्दों से जो बनता है, उसे मंत्र कहते हें। मंत्रों के जप करने से व्यक्ति के भीतर जो ध्वनि तरंग वाली शक्ति उत्पन्न होती है, उसे ही जप योग या मंत्र योग कहते हैं।

मन के पार एक मन

सम्मोहन विद्या भारतवर्ष की प्राचीनतम विद्या है। इसे योग में 'प्राण विद्या' या 'त्रिकालविद्या' के नाम से जाना जाता रहा है। अंग्रेजी में इसे हिप्नटिज़म कहते हैं। विश्वभर में हिप्नटिज़म के जरिए बहुत से असाध्य रोगों का इलाज भी किया जाता रहा है। आज भी सम्मोहन सिखाने या इस विद्या के माध्यम से इलाज करने के लिए बहुत सारे केंद्र प्रमुख शहरों में संचालित हो रहे हैं।

मन को सम्मोहित करना : मन के कई स्तर होते हैं। उनमें से एक है आदिम आत्म चेतन मन। आदिम आत्म चेतन मन न तो विचार करता है और न ही निर्णय लेता है। उक्त मन का संबंध हमारे सूक्ष्म शरीर से होता है। यह मन हमें आने वाले खतरे या उक्त खतरों से बचने के तरीके बताता है। यह छटी इंद्री जैसा है या समझे की यह सूक्ष शरीर ही है। गहरी नींद में इसका आभास होता हैं।

यह मन लगातार हमारी रक्षा करता रहता है। हमें होने वाली बीमारी की यह मन छह माह पूर्व ही सूचना दे देता है और यदि हम बीमार हैं तो यह हमें स्वस्थ रखने का प्रयास करता है। बौद्धिकता और अहंकार के चलते हम उक्त मन की सुनी-अनसुनी कर देते हैं। उक्त मन को साधना ही सम्मोहन है या उक्त मन में जाग जाना ही सम्मोहन है।

मन के पार एक मन : जब आप गहरी नींद में सो जाते हैं तो यह मन सक्रिय हो जाता है। चेतन मन अर्थात जागी हुई अवस्था में सोचने और विचार करने वाला मन जब सो जाता है तब अचेतन मन जाग्रत हो जाता हैं, जिसके माध्यम से व्यक्ति या तो सपने देखता है या गहरी नींद का मजा लेता है, लेकिन व्यक्ति जब सोते हुए भी उक्त मन में जाग जाए अर्थात होशपूर्ण रहे तो यह मन के पार चेतना का दूसरे मन में प्रवेश कर जाना है, जहाँ रहकर व्यक्ति अपार शक्ति का अनुभव करता है।

यह संभव है अभ्यास से। यह बहुत सरल है, जबकि आप यह महसूस करो कि आपका शरीर सो रहा है, लेकिन आप जाग रहे हैं। इसका मतलब यह कि आप स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर में प्रवेश कर गए हैं तो आपकी जिम्मेदारी बढ़ जाती है क्योंकि इसके खतरे भी है।

मन को साधने का असर : सम्मोहन द्वारा मन की एकाग्रता, वाणी का प्रभाव व दृष्टि मात्र से उपासक अपने संकल्प को पूर्ण कर लेता है। इससे विचारों का संप्रेषण (टेलीपैथिक), दूसरे के मनोभावों को ज्ञात करना, अदृश्य वस्तु या आत्मा को देखना और दूरस्थ दृश्यों को जाना जा सकता है। इसके सधने से व्यक्ति को बीमारी या रोग के होने का पूर्वाभास हो जाता है।

कैसे साधें इस मन को : प्राणायम से साधे प्रत्याहार को और प्रत्याहार से धारणा को। इसको साधने के लिए त्राटक भी कर सकते हैं त्राटक भी कई प्रकार से किया जाता है। ध्यान, प्राणायाम और नेत्र त्राटक द्वारा सम्मोहन की शक्ति को जगाया जा सकता है। त्राटक उपासना को हठयोग में दिव्य साधना से संबोधित किया गया है। उक्त मन को सहज रूप से भी साधा जा सकता है। इसके लिए आप प्रतिदिन सुबह और शाम को प्राणायाम के साथ ध्यान करें।

अन्य तरीके : कुछ लोग अँगूठे को आँखों की सीध में रखकर तो, कुछ लोग स्पाइरल (सम्मोहन चक्र), कुछ लोग घड़ी के पेंडुलम को हिलाते हुए, कुछ लोग लाल बल्ब को एकटक देखते हुए और कुछ लोग मोमबत्ती को एकटक देखते हुए भी उक्त साधना को करते हैं, लेकिन यह कितना सही है यह हम नहीं जानते।

आप उक्त साधना के बारे में जानकारी प्राप्त कर किसी योग्य गुरु के सान्निध्य में ही साधना करें।

- अनिरुद्ध जोशी 'शतायु' 

Saturday, September 12, 2009

शनि का कन्या में गमन

भारती पंडित
9 सितंबर 09 को यानी 9-9-09 के अद्‍भुत संयोग वाले दिन शनि देव सिंह राशि से कन्या में प्रवेश कर रहे हैं। उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में कन्या में लोहे के पाये से प्रवेश के कारण ये पहले 90 दिन पीड़ाकारक रहेंगे। वृषभ व मकर राशि वालों को ढैया से मुक्ति मिलेगी, कर्क राशि भी साढ़ेसाती से मुक्त होगी। वही तुला पर साढ़ेसाती व मिथुन व कुंभ के लिए ढैया का प्रारंभ होगा। आइए देखें शनिदेव के आगमन से अन्य राशियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

मेष : मेष राशि के लिए शनि स्वास्थ्य लाभ व धन लाभ देंगे मगर चिंताएँ लेकर आएँगे। परिवार, संतान व व्यापार-नौकरी संबंधित चिंताएँ परेशान कर सकती हैं।

वृषभ : हालाँकि ढैया से मुक्ति हो रही है। फिर भी पीड़ा व स्त्री-पुत्र को स्वास्थ्य कष्ट हो सकता है। सोच-समझकर निर्णय लेना चाहिए।

मिथुन : ढैया शुरू हो रही है। पीड़ाकारक है ये शनिदेव- भाई-परिवार से विवाद, यात्रा में कष्ट-भागदौड़, हानि व चिंता के योग हैं। नौकरी में भी सावधानी रखें।


कर्क : अच्छा समय है। पराक्रम वृद्धि, शत्रु विजय, धन लाभ, प्रमोशन व स्थानांतरण की सौगात लाए हैं शनिदेव।

सिंह : धनलाभ के योग हैं मगर बेहद भागदौड़ के बाद। चोट-चपेट का भी भय रहेगा। नौकरी में भी कष्ट हो सकता है। निर्णय लेते समय जल्दबाजी न करें।

कन्या : आलस्य, मानसिक पीड़ा व भय लेकर आ रहे हैं ये शनिदेव। वाद-विवाद व व्यर्थ भागदौड़ होगी, धन हानि के भी योग हैं। सावधानी रखना चाहिए।

तुला : साढ़ेसाती प्रारंभ है मगर ताँबे के पाये से हैं अत: श्रम व कष्ट बढ़ेगा, भागदौड़ करनी होगी परंतु साथ ही धन-वाहन सुख तथा अन्य सुविधाएँ बढ़ाने आ रहे हैं शनिदेव।

वृश्चिक : अच्छा समय, मान-सम्मान व धन प्राप्ति होगी। शुभ फल मिलेंगे, वाहन मशीनरी से लाभ होगा। मानसिक कष्ट दूर होंगे।

धनु : धन लाभ व आर्थिक अनुकूलता के योग तो बनेंगे मगर खर्च बढ़ने, भागदौड़-श्रम होने व स्थानांतरण के योग भी हैं। पेट व छाती के रोगों से सावधानी रखें।

मकर : ढैया से मुक्ति है मगर चिंता बनी रहेगी। कार्य की सफलता के लिए बेहद श्रम करना होगा। शरीर कष्ट रहेगा। वाहन भी सावधानी से चलाना चाहिए।

कुंभ : ढैया का प्रारंभ है मगर स्वराशि होने से शनिदेव अनुकूलता बनाएँगे। सुख-सुविधाएँ बढ़ेंगी। मगर जीवन अव्यवस्थित हो जाएगा, अधिक रिस्क नहीं लेना चाहिए। इस दौरान कर्ज लेने से भी बचें। शेष स्थिति ठीक है।

मीन : मानसिक तनाव व ढेर सारी भागदौड़ के बाद धन लाभ दिलाएँगे शनिदेव। व्यर्थ चिंता व डर भी रहेगा। दूर यात्रा का योग भी बन सकता है। धन का सही नियोजन करना सीखिए।

Shani dev Shani Grah 1. साढ़ेसाती के साढ़े सात वर्षों में से लगभग 46 महीने का समय शुभ व उन्नतिदायक ही रहता है। अत: यदि शेष माह सावधानी से बिताएँ जाएँ तो अशुभ प्रभाव न के बराबर अनुभव में आते हैं।

2.
पत्रिका में यदि शनि 3-6-11 या 5-9 स्थानों में हो, त्रिकोणेश या लग्नेश हो तो शुभ प्रभाव अधिक मिलते हैं।

3.
शनि की प्रतिकूल स्थिति में शनि का दान करना, शनि चालीसा पढ़ना, हनुमानजी की उपासना करना, शनि स्तोत्र पढ़ना व काले कुत्ते की सेवा करना अच्छा होता है।

4.
यदि व्यक्ति नियमबद्ध आचरण करता है, संस्कारशील है, माँस-मदिरा से दूर रहता है, लोगों की सहायता व स्त्री का सम्मान करता है। ईमानदार है तो शनिदेव उसे कभी परेशान नहीं करते।

शनि का कन्या राशि में आगमन

बारह राशियों पर प्रभाव शनि का राशि परिवर्तन
पं. अशोक पँवार 'मयंक'

ढाई वर्ष सिंह राशि वालों को किया परेशान अब कन्या की बारी है। शनि का कन्या राशि में आगमन 9 सितंबर को रात्रि में 11.30 पर वृषभ लग्न में उत्तरा फाल्गुनी के द्वितीय चरण में हो रहा है। शनि वृषभ लग्न में प्रवेश कर पंचम भाव में उच्च के बुध के साथ आ रहा है। जहाँ लग्न में मित्र राशि का है वहीं नवांश लग्न में स्वराशि मकर का रहेगा। शनि का राशि परिवर्तन कैसा रहेगा, आइए जानें।

राशियों पर प्रभाव :
मेष- मेष राशि वालों के लिए शनि का गोचरीय भ्रमण षष्ट भाव पर होने से रोग-शोक दूर होंगे, कर्ज की स्थिति में कमी, वाहनादि सावधानी से चलाएँ। प्रवास के योग बनेंगे, बाहरी संबंधों में सुधार रहेगा। पराक्रम में वृद्धि, भाइयों का सहयोग, शत्रु नष्ट होंगे।

वृषभ- वृषभ राशि वालों के लिए शनि का गोचरीय भ्रमण पंचम भाव से होने के कारण संतान से लाभ, दिमागी कार्यों में सफलता रहेगी। स्त्री कष्ट, दैनिक व्यापार में कुछ कमी रहेगी, धन लाभ मिला-जुला रहेगा, वाणी का प्रभाव बढ़ेगा, कुटुंब का सहयोग रहेगा।

मिथुन- इस राशि पर ढैया सोने के पाद से होने के कारण निजीजन विरोध, शत्रु बढ़ेंगे, गृहक्लेश, व्यय, धननाश व शारीरिक पीड़ा होगी।

कर्क- कर्क राशि वालों पर शनि का गोचरीय भ्रमण तृतीय भाव में होने के कारण पराक्रम में वृद्धि, शत्रु नाश, संतान को, विद्यार्थियों को कष्ट रहेगा, भाग्य में मिली-जुली स्थिति रहेगी। बाहरी मामलों में सावधानी बरतें, यात्रा में संभलकर चलें।

सिंह- शनि सिंह राशि पर उतरती रजत पाद पर होने से व्यापार में प्रगति, धन-धान्य, समृद्धि, प्रभाव क्षेत्र बढ़ेगा, सम्मान प्राप्त होगा, सुख-संपदा में लाभ, घर में मांगलिक कार्य होंगे।

कन्या- कन्या राशि पर ह्रदय पर लोह पाद पर होने से शारीरिक कष्ट, रक्त-पित्त विकार, स्त्री कष्ट, संतान को कष्ट, व्यापार में हानि, राजभय यानी सर्विस के क्षेत्र में बाधा रहेगी।


तुला- तुला पर ताँबे के पाद पर लगती शनि की साढ़ेसाती धन-धान्य, समृद्धि, स्त्री-पुत्र सुख, सुख-संपत्ति लाभ, व्यवसाय में प्रगति, शारीरिक सुख।

वृश्चिक- वृश्चिक राशि पर शनि का गोचरीय भ्रमण एकादश भाव से करने के कारण आय में लाभ देगा, लेकिन शारीरिक पीड़ा, चिड़चिड़ापन भी रहेगा। संतान व विद्या के क्षेत्र में मिली-जुली स्थिति रहेगी, आयु में लाभ रहेगा।

धनु- धनु राशि वालों के लिए शनि का गोचरीय भ्रमण दशम भाव में होने से राज्य, व्यापार, नौकरी में लाभ व सहयोग मिलेगा, पिता से लाभ व सहयोग पाएँगे। बाहरी मामलों में सावधानी रखें, माता, जमीन-जायदाद में मिली-जुली स्थिति रहेगी। स्त्री से सहयोग, विवाह योग बनेंगे।

मकर- मकर राशि वालों के लिए भाग्य नवम भाव से भ्रमण करने से भाग्य में वृद्धि, धर्म-कर्म में सहयोग, आय में सावधानी रखें, शेयर बाजार में जोखिम से बचें। भाई से सहयोग, पराक्रम में वृद्धि, शत्रु नष्ट, मामा पक्ष से लाभ व सहयोग रहेगा।

कुंभ- कुंभ पर शनि का ढैया ताम्र पाद पर होने से धन-धान्य समृद्धि, स्त्री-पुत्र सुख, आर्थिक लाभ, संपत्ति लाभ, व्यापार-व्यवसाय में उन्नति, स्वास्थ्य लाभ रहेगा।

मीन- मीन राशि वालों के लिए शनि का भ्रमण सप्तम से होने से दाम्पत्य जीवन में सुधार, अविवाहित के लिए खुश-खबर, स्वप्रयत्नों से प्रगति होगी व माता के स्वास्थ्य में सुधार, पारिवारिक स्थिति ठीक रहेगी। बाकी राशियों के बारे में साढ़ेसाती व ढैया में देखें।


बाजार की स्थिति कैसी रहेगी - जब भी कन्या राशि में शनि का प्रवेश हुआ है तभी राजनीतिक व प्राकृतिक कारणों से बाजारों में तेजी का रुख रहा है। शनि का सीधा प्रभाव कच्ची फसलों व पैदावार पर पड़ता है। इसका असर शेयर बाजार में, लोहा व लोहे की मशीनरी, पेट्रोल, डीजल पर भी देखा गया है। अलसी, कपास, सरसों में तेजी का रुख रहता है। गुड़, खाण्ड, नमक व अनाजों में तेजी और सोना, रूई तेज रहेगी। चाँदी में जरूर घट-बढ़ रहेगी।

भारत पर प्रभाव कैसा रहेगा - स्वतंत्र भारत का लग्न वृषभ है। इस प्रकार से देखा जाए तो शनि का गोचरीय भ्रमण पंचम से होगा और शनि स्व‍तंत्र लग्न में तृतीय भाव में चन्द्र की राशि कर्क पर है। इस प्रकार से शनि का पंचम भाव पर दोगुना प्रभाव होने से विद्यार्थी वर्ग कष्ट अनुभव करेगा, मनोरंजन के क्षेत्र पर विपरीत प्रभाव रहेगा।

दैनिक व्यवसाय से जुड़े व्यक्ति परेशानी का अनुभव करेंगे। स्त्रियों को कष्ट रहेगा, सत्ता पक्ष के नेतागण अपनी बुद्धि बल द्वारा प्रत्येक क्षेत्र में सफल होंगे, अपने लाभ के लिए कार्य करेंगे। भारत की आय में मिली-जुली स्थिति रहेगी, भाग्य के क्षेत्र में वृद्धि होगी। भारतीय कोष में धन की वृद्धि होने की संभावना है। सैन्य प्रशासन को चुस्त-दुरुस्त रखना होगा। पड़ोसी देश से खतरा रहने की संभावना रहेगी।