Thursday, July 18, 2013

वैदिक प्रश्नोत्तरी


स्वामी जी इस सृष्टि का स्वामी एवं नियंता कौन है? इस सृष्टि में प्रथम कौन आया?
इस सृष्टि का स्वामी एवं नियंता स्वयं सर्वशक्तिमान निराकार, सर्वव्यापक ईश्वर है जो सृष्टि का रचयिता, पालनकर्ता एवं संहारकर्ता है। सृष्टि रचना नित्य एवं शाश्वत है। जीवात्मा का स्वरूप भी नित्य एवं शाश्वत है तथा जीवात्माएं अपने द्वारा किए हुए शुभ एवं अशुभ कर्मों के आधार पर ही शरीर धारण करती हैं। इसके अतिरिक्त जड़-प्रकृति, जिसके द्वारा संपूर्ण जड़ ब्रह्मांड की रचना होती है, वह भी नित्य एवं शाश्वत है। अतः चेतन ईश्वर, चेतन जीवात्माएं एवं जड़ प्रकृति, ये नित्य एवं शाश्वत तीन विषय हैं, जिनके बारे में वेदों में वर्णन किया गया है। यही वेदों में कहा त्रैतवाद है। अतः इस आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि प्रथम कौन आया, क्योंकि सृष्टि रचना का न कोई आदि है और न कोई अंत। पृथवी बनती है, नष्ट होती है और पुनः बन जाती है।

भगवद् गीता किस की रचना है?
श्रीमद्भगवद् गीता महाभारत ग्रंथ के भीष्म पर्व के 18 अध्याय हैं जो व्यासमुनि द्वारा रचित हैं। मैं आपको सलाह देता हूं कि आप ईश्वर कृपा से मेरे द्वारा रचित ‘श्रीमद्भगवद् गीता – एक वैदिक रहस्य’ का अध्ययन करें।

वेद एवं ईश्वर के ज्ञाता ब्राह्मण को दान क्यों दिया जाता है?
यजुर्वेद मंत्र 31/11 के अनुसार वेद एवं ईश्वर के ज्ञाता को ब्राह्मण कहते हैं और धर्म स्थापना के लिए इन्हें दान दिया जाता है। नट-नर्तकों को यश के लिए, सेवकों को भरण-पोषण और राजाओं को भय के कारण दान दिया जाता है।

ज्ञान किसे कहते हैं?
वेद ही ज्ञान है। वेदाध्ययन, वेदानुसार शुभ-कर्म एवं योग-साधन द्वारा परमात्म तत्त्व का यथार्थ बोध ही ज्ञान है।

शम क्या कहलाता है?
चित्त की शांति ही शम है।

मनुष्य का दुर्जय शत्रु कौन सा है?
क्रोध मनुष्य का दुर्जय शत्रु है।

अनंत व्याधि (अनंत दुख) क्या है?
लोभ अनंत व्याधि है?

मोह किसे कहते हैं?
धर्म मूढ़ता (कर्त्तव्य पालन न करना) ही मोह है।

स्वामी जी वेद किसने लिखे हैं?
वेद ऋषि, मुनि, मनुष्य आदि किसी ने भी नहीं लिखे हैं। वेद का अर्थ है ज्ञान। यजुर्वेद मंत्र 7/4 में स्पष्ट किया है कि यह ज्ञान पृथ्वी रचना के आरंभ में ईश्वर से निकलकर अमैथुनी सृष्टि के चार ऋषियों के हृदय में ईश्वर की सामर्थ्य से प्रकट होता है। हम मनुष्य हैं, हमें कागज, कलम आदि का सहारा चाहिए। ईश्वर सर्वशक्तिमान है, अतः उसे कागज, कलम, दवात अथवा आंख, नाक, हाथ आदि के सहारे की आवश्यकता नहीं है। इसलिए वेद का ज्ञान बिना बोले और बिना लिखें इन ऋषियों में प्रकट होता है।
वृद्ध कौन है?
मनु-स्मृति श्लोक 2/128 में कहा-चाहे कोई 100 वर्ष की आयु का भी हो परंतु जो विद्या विज्ञान से रहित है वह बालक है और जो विद्या विज्ञान का दाता है उस बालक को भी पिता के  समान मानना चाहिए। क्योंकि विद्वान जन अज्ञानी को बालक और ज्ञानी को पिता कहते हैं। ऋग्वेद मंत्र 5/43/15 में भी कहा है कि जो वेद और योग-विद्या के ज्ञान से शुद्ध बुद्धि प्राप्त करते हैं तथा सदा श्रेष्ठ शुभ कर्म ही करते हैं, उन्हें भी वृद्ध अथवा विद्वान कहते हैं।

Monday, June 17, 2013

।। मां गायत्री चालीसा ।।


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ह्रीं श्रीं क्लीं मेधा प्रभा जीवन ज्योति प्रचंड ॥
शांति कांति जागृत प्रगति रचना शक्ति अखंड ॥1॥
जगत जननी मंगल करनि गायत्री सुखधाम ।
प्रणवों सावित्री स्वधा स्वाहा पूरन काम ॥ २॥
भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी ।
गायत्री नित कलिमल दहनी ॥॥
अक्षर चौबीस परम पुनीता ।
इनमें बसें शास्त्र श्रुति गीता ॥॥
शाश्वत सतोगुणी सत रूपा ।
सत्य सनातन सुधा अनूपा ॥॥
हंसारूढ श्वेतांबर धारी ।
स्वर्ण कांति शुचि गगन-बिहारी ॥॥
पुस्तक पुष्प कमंडलु माला ।
शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला ॥॥
ध्यान धरत पुलकित हित होई ।
सुख उपजत दुख दुर्मति खोई ॥॥
कामधेनु तुम सुर तरु छाया ।
निराकार की अद्भुत माया ॥॥
तुम्हरी शरण गहै जो कोई ।
तरै सकल संकट सों सोई ॥॥
सरस्वती लक्ष्मी तुम काली ।
दिपै तुम्हारी ज्योति निराली ॥॥
तुम्हरी महिमा पार न पावैं ।
जो शारद शत मुख गुन गावैं ॥॥
चार वेद की मात पुनीता ।
तुम ब्रह्माणी गौरी सीता ॥॥
महामंत्र जितने जग माहीं ।
कोउ गायत्री सम नाहीं ॥॥
सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै ।
आलस पाप अविद्या नासै ॥॥
सृष्टि बीज जग जननि भवानी ।
कालरात्रि वरदा कल्याणी ॥॥
ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते ।
तुम सों पावें सुरता तेते ॥॥
तुम भक्तन की भक्त तुम्हारे ।
जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे ॥॥
महिमा अपरम्पार तुम्हारी ।
जय जय जय त्रिपदा भयहारी ॥॥
पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना ।
तुम सम अधिक न जगमें आना ॥॥
तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा ।
तुमहिं पाय कछु रहै न क्लेसा ॥॥
जानत तुमहिं तुमहिं व्है जाई ।
पारस परसि कुधातु सुहाई ॥॥
तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई ।
माता तुम सब ठौर समाई ॥॥
ग्रह नक्षत्र ब्रह्मांड घनेरे ।
सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे ॥॥
सकल सृष्टि की प्राण विधाता ।
पालक पोषक नाशक त्राता ॥॥
मातेश्वरी दया व्रत धारी ।
तुम सन तरे पातकी भारी ॥॥
जापर कृपा तुम्हारी होई ।
तापर कृपा करें सब कोई ॥॥
मंद बुद्धि ते बुधि बल पावें ।
रोगी रोग रहित हो जावें ॥॥
दरिद्र मिटै कटै सब पीरा ।
नाशै दुख हरै भव भीरा ॥॥
गृह क्लेश चित चिंता भारी ।
नासै गायत्री भय हारी ॥॥
संतति हीन सुसंतति पावें ।
सुख संपति युत मोद मनावें ॥॥
भूत पिशाच सबै भय खावें ।
यम के दूत निकट नहिं आवें ॥॥
जो सधवा सुमिरें चित लाई ।
अछत सुहाग सदा सुखदाई ॥॥
घर वर सुख प्रद लहैं कुमारी ।
विधवा रहें सत्य व्रत धारी ॥॥
जयति जयति जगदंब भवानी ।
तुम सम ओर दयालु न दानी ॥॥
जो सतगुरु सो दीक्षा पावे ।
सो साधन को सफल बनावे ॥॥
सुमिरन करे सुरूचि बडभागी ।
लहै मनोरथ गृही विरागी ॥॥
अष्ट सिद्धि नवनिधि की दाता ।
सब समर्थ गायत्री माता ॥॥
ऋषि मुनि यती तपस्वी योगी ।
आरत अर्थी चिंतित भोगी ॥॥
जो जो शरण तुम्हारी आवें ।
सो सो मन वांछित फल पावें ॥॥
बल बुधि विद्या शील स्वभाउ ।
धन वैभव यश तेज उछाउ ॥॥
सकल बढें उपजें सुख नाना ।
जे यह पाठ करै धरि ध्याना ॥
यह चालीसा भक्ति युत पाठ करै जो कोई ।
तापर कृपा प्रसन्नता गायत्री की होय ॥

Sunday, April 21, 2013

अगर सभी अपने घर के बाहर की सफाई करें तो सारी दुनिया साफ हो जाएगी


जर्मन साफ सुथरे माने जाते हैं। भले ही वह स्विस लोगों जितने साफ नहीं हों, लेकिन वह एकदम चकाचक देशों में शामिल है। पत्रकार पेटर सूडाइक इसे जर्मनों की दीवानगी बताते हैं।


दुनिया में आम तौर पर स्विटजरलैंड सबसे साफ देश माना जाता है। इसकी सड़कें इतनी साफ होती हैं कि आप उस पर खाना रख कर खा लें। अपने पेड़ों की हमेशा काट छाट करने वाले, पहाड़ियों की चोटी साफ करने वाले और घरों के बाहर झाड़ू बुहार करने वालों से जर्मन टक्कर लें तो कैसे? या हम ऐसा कह सकते हैं कि सफाई के मामले में स्विस लोग जर्मन लोगों का चरमपंथी संस्करण हैं। हमें अपनी उपलब्धियों को दूसरों की सफाई की छाया में छिपने देने की जरूरत नहीं।

मैं योहान वोल्फगांग गोएथे को अपने पहले सबूत के तौर पर पेश करता हूं। 'सभी अगर अपने घर के बाहर की सफाई करें तो सारी दुनिया साफ हो जाएगी।' और एक बार उन्होंने कहा था कि यह सिर्फ कहावत नहीं बल्कि जर्मन अस्मिता का मुख्य सच है।

एक ओर तो वह ये कहते हैं कि आप अपना कचरा खुद साफ करें और दूसरे के काम में दखल न दें। लेकिन दूसरी ओर शायद उन्होंने यह भी कहा हो सकता है कि जर्मनों को साफ सफाई करना पसंद है। जैसा कि जर्मनी के दर्शनशास्त्री ऑटो फ्रीडरिष बोलनाऊ ने कहा था, 'जब व्यापारियों ने अपनी दुकान खोल ली हो, जब घर की औरतों ने घर को एकदम चकाचक साफ कर दिया हो और घर के सामने की सड़क भी बुहार दी हो तब जा कर लोगों को चैन की सांस आती है।'

यही सोच जर्मनी के अधिकतर इलाकों में है और कुछ इलाकों में तो बहुत ही ज्यादा, जैसे कि स्वेबिया में। यहां साफ-सफाई के लिए एक हफ्ते का सिस्टम है, केहरवोखे। यह अपार्टमेंट में चलने वाला सिस्टम है जहां हर मकान वाले की सीढ़ियां, सेलर और बाहर के रास्ता साफ करने की एक-एक बार जिम्मेदारी आती है। सबको पता होता है कि किस हफ्ते किसकी बारी है और सब पूरी कोशिश करते हैं कि वो टाइमटेबल से चलें। अधिकतर यह आराम से चलता रहता है।

हालांकि...सिर्फ सड़कें ही नहीं चमकती बल्कि कपड़े भी एकदम साफ बेदाग होने चाहिए। जब मैं बड़ा हो रहा था तब भले ही मेरे मोजे रफू करने की स्थिति तक पहुंच जाएं उन्हें रोजाना धोया जाता था। मेरी मां की पूरी कोशिश होती कि भगवान न करे कि कभी मेरा एक्सीडेंट हो जाए और मुझे ऑपरेशन टेबल पर जाना पड़े तो मेरी अंडरवीयर गंदी न हो।

अब बीयर, इसे भी जर्मन शुद्धता कानून पर खरा उतरना बहुत जरूरी है। हमें सफाई अंकों में भी बहुत पसंद है। 13 वीं सदी के एक जर्मन कवि ने, जो स्वेबिया के थे, लिखा था, 'जहां भी सूरज की रोशनी पड़ती है, सूरज की रोशनी सब शुद्घ करती है। भले ही जो भी पादरी हो, सभा हमेशा शुद्ध होती है। सभा और सूरज की रोशनी हमेशा शुद्ध होती है।'

हम जर्मनों का विश्वास है कि जब मामला शुद्धता और सफाई का हो तो इसे सीखने की कोई उम्र नहीं होती। टॉयलेट से जुड़ी ट्रेनिंग जर्मन में राइनलिषकाइट्सएरजीहुंग कहलाती है, यानी साफ सफाई की शिक्षा। तो फिर अब तुरंत हाथ धोइए...

लेख: पेटर सूडाइक/आभा मोंढे 
संपादन: महेश झा

मुक्ति

अनन्त आवरणों में बन्धा हुआ जीव मुक्ति की कामना करे, छटपटाए यह तो समझ में आता है, किन्तु मुक्त व्यक्ति पहले स्वयं को बान्धे, बान्धता ही चला जाए और साथ-साथ मुक्ति की कामना करता रहे, यह समझ में नहीं आता। यह आज के मानव की तस्वीर है, जो यह सिद्ध कर रही है कि मानव-देह सृष्टि के लिए अति विशिष्ट योनि है। 

मानव की स्वतंत्र बुद्धि, शरीर की स्वतंत्रता और ज्ञान का अहंकार ही सृष्टि की अन्य योनियों के विकास एवं उनकी निरन्तरता के लिए उत्तरदायी है। वही अपने कर्म-फलों के अनुरूप विभिन्न योनियों को प्राप्त होता रहा है। अन्य योनियों को, जिसमें देवयोनि भी सम्मिलित हैं, भोग योनियां कहा है। वे अपना नया कर्म करने को स्वतंत्र नहीं हैं। यही मानव योनि की विशेषता है।

मानव देह भी कर्म-फल के रूप में ही प्राप्त होती है। इसमें व्यक्ति पुराने कर्मो के फल भी भोगता है और नए कर्म भी अर्जित करता है। विद्या और अविद्या ही कर्मो का आधार होता है। ज्ञान और कर्म के पर्याय हैं। जब जीवन की सारी गतिविधियां अन्नमय, प्राणमय और मनोमय कोश के भीतर चलती हैं, तब उनको कर्म कहते हैं। 

जब इनका कार्य क्षेत्र मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय कोश होता है, तब ज्ञान या विद्या के रूप में जाना जाता है। कर्म के साथ बन्धन का सीधा सम्बन्ध है और विद्या मुक्ति का मार्ग है। आत्मा के पास ये दो ही विकल्प हैं।

बन्धन के मूल में अहंकार रहता है। इसका केन्द्र अहंकृति है। इसी के अनुरूप प्रकृति होती है। प्रकृति का प्रतिबिम्ब आकृति होती है। जैसे-जैसे प्रकृति बदलती जाती है, वैसे-वैसे ही अगले जन्मों की आकृति तय होती जाती है। अन्त समय जब व्यक्ति देहातीत होकर समाधि ग्रहण करता है, तब सभी आकृतियों से मुक्त हो जाता है। कालातीत हो जाती है।

व्यक्ति का अहंकार अपने से कमजोर व्यक्ति के अधिकारों का हनन या अतिक्रमण करता रहता है। इसी क्रम में वह स्वयं को बन्धनों में जकड़ता ही चला जाता है। घर में एक नौकर रखकर हम सोचते हैं कि बहुत कुछ हल्के हो गए। होता बिल्कुल उल्टा है। हम स्वयं उससे बन्ध जाते हैं। हर पल उसके कार्यो पर ही आंखें टिकी रहती हैं। उसकी भाषा एवं उसके व्यवहार की चर्चा, उसके अज्ञान और अनाड़ीपन की चर्चा हमारे जीवन का बड़ा हिस्सा घेर लेती है। 

इतनी चर्चा न तो पति-पत्नी एक दूसरे की करते हैं। न ही बच्चों के बारे में एक-एक शब्द का आकलन होता है। बल्कि नौकर की चर्चा से स्वामी का अभिमान ही बढ़ता जाता है। उसकी/ उनकी भाषा में भी हल्कापन प्रवेश कर जाता है। नौकर नहीं हो तो स्वामी कैसा? अहंकार किसका? अज्ञान का आग्रह रहता है कि कर्म योग से बाहर रहना ही समृद्धि का प्रमाण-पत्र है।

अहंकार ही राग-द्वेष का सूत्रधार है। आसक्ति आंखों पर चढ़ी पट्टी है। खुली आंखों पर। जीवन के सारे सम्बन्ध ही बन्ध हैं। सम्+बन्ध। जन्म लिया है तो समाज के बन्ध भी रहेंगे। हालांकि, प्रकृति में कोई बन्ध नहीं है। हम अपने ही कर्म बन्धनों को प्रकृति का नाम दे देते हैं। जैसे कि शादियां तो स्वर्ग में ही तय हो जाती हंै। जैसे कि स्वर्ग हमको बान्धना चाहता हो।

या "शादी तो सात जन्म साथ रहने का मार्ग है।" साथ ही यह भी कहते हैं कि यह तो हमारा सातवां जन्म है। गले तक भर गए हैं, अब मुक्त होना चाहते हैं। ऎसा बन्धन आगे और नहीं चाहिए। सच पूछो तो यही मुक्ति द्वार है। इतनी विरक्ति हो जाना, कि पीछे मुड़कर देखने की इच्छा भी मर जाए, ग्रन्थि बंधन के खुलने की शुरूआत है। कितनी शक्ति लगाई होगी दोनों ने, दूर होने के लिए। कितने आरोप जड़े होंगे, कितना अविश्वास जताया होगा, अपने बन्धन में! कुछ तानों की नित्य बौछार भी साथ बनी रहती है, ताकि स्मृतियां भी उसको लौटा न लाएं। ये कैसा मुक्ति बोध! 

बन्धन तो इच्छा का नाम है। मुक्त हो पाना कैसे संभव है। इच्छा के साथ ही मन पैदा हो जाता है। मन के होते ही विद्या-अविद्या के मार्ग सामने आ जाते हैं। हर सम्बन्ध को सामने देखकर कोई न कोई कामना-भावना मन में उठने लगती है। इस बन्धन से मुक्ति, हर ऎसे बन्धन से मुक्ति, जिनको देखकर मन प्रसन्न होता है, उनके बन्धन से भी मुक्ति। 

हम जिन पर रौब मारते हैं, आदेश देकर जिनकी स्वतंत्रता छीनते हैं, उनसे भी मुक्ति। आखिर यहां भी हम स्वयं को उनका अधिकारी ही मानते हैं। कोई भी कामना जब धारणा बन जाती है, संकल्प बनकर जीवन का अंग बन जाती है, तब उससे मुक्त होना और भी कठिन हो जाता है। जिन-जिन सम्बन्धों के रूप में, प्रेम या घृणा में अपने मन की सिलाई कर ली जाए, संयोग-मिलन-बिछोह पर भीतर आन्दोलन होते रहे हैं, उनसे तो कैसी मुक्ति!

कितना दुलार करते हैं हम शरीर को। पूरी उम्र की मेहनत की कमाई खर्चते हैं, जिस शरीर के सुख और आराम के लिए, मौज-मस्ती के लिए, मनोरंजन और व्यसनों के लिए, जिसको स्वस्थ रखने के लिए, छोड़ दे उसका ख्याल? जो करता है प्रेम अनेक को और अनेक करते हों प्रेम जिसको, जिसका स्पर्श मात्र पैदा कर देता है स्पन्दन दिलों में, जिसके भीतर बैठा हूं मैं स्वयं और खो जाऊंगा उसके बाद, उससे मुक्ति का अर्थ? जिन श्वासों के सहारे मैं जिन्दा हूं, मेरा शरीर खड़ा है, मैं पृथ्वी और सूर्य से निरन्तर जुड़ा हुआ हूं, मेरे मन में कामना पैदा होती है, उनसे मुक्त होने की बात मन में उठ भी कैसे सकती है।

बन्धन ही निर्माण है। जोड़ना है। धन है-अमानत है-परिणाम है। इसी के लिए तो व्यक्ति जीता है। चिनाई को ही बन्ध कहते हैं। चाहें शरीर में पंच महाभूतों की हो, विचारों की हो अथवा भावना की। विचारों को छोड़ पाना तो बहुत ही कठिन है। व्यक्ति इन्हीं के सहारे आदान-प्रदान करता है, संवाद करता है, समाज में अपनी पहचान बनाता है। सबसे महžवपूर्ण बात यह है कि वह अपने अहंकार की तुष्टि करता है। जीवन के उपक्रम साध्य करता है।

विचारों के माध्यम से ही शब्द-ब्रह्म की प्रतिष्ठा होती है। उपासना और अनुष्ठान होते हैं। मंत्र शक्ति से जुड़ता है। अपने इष्ट की आराधना करता है। भावी सपने बुनता है। धर्म और अर्थ के क्षेत्र में मोक्ष की तलाश करता रहता है। तब इस के मानसिक स्वरूप से विच्छेद कर पाना साक्षात् मृत्यु ही है। वैसे तो चेतना के जागरण बिना भी जीवन तो मृत्यु ही है। चेतना का जागरण होता है संकल्प से, विद्या से। यही मुक्ति मार्ग का पहला सोपान है। यहीं से ऊध्र्व यात्रा शुरू होती है। 

विद्या के धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऎश्वर्य से अविद्या, अस्मिता, आसक्ति, अभिनिवेश से मुक्ति मिलती है। शरीर की अनावश्यक क्रियाओं में ठहराव आता है। श्वास लयबद्ध होने लगती है। मन का बाहरी सम्बन्ध भी घटने लगता है। इन्द्रियां भीतर मुड़ने को तत्पर रहती हैं। इसका अर्थ यही है कि शरीर का मोह छूटने लगता है। सौन्दर्य और स्वास्थ्य से जुड़े प्रश्न गौण होने लगते हैं। तब श्वास भी स्वत: ही मन्द पड़ने लगती है। मुक्त होने का यह प्रथम प्रयास है। साथ ही यह भी निश्चित है कि जब तक प्रयास है, हम मुक्त नहीं है। मन शरीर एवं बुद्धि से बन्धा है। प्रयास रहित सहजता ही मुक्ति है। 

शरीर के साथ ही इससे जुडे सम्बन्धों का संयोग भी विदा होने लगता है। वास्तव में तो व्यक्ति अपना यात्रा पथ देखने लग जाता है। उसका भावी लक्ष्य मुखरित हो जाता है। अतीत भी स्पष्ट हो जाता है। तब एक संकल्प का उदय होता है अथवा पुराने को ही बार-बार दोहराया जाता है। एक-एक बन्धन को समझता जाता है। समझ लेना ही ग्रन्थि मोचन है। जैसे रस्सी में लगी गांठ। उसको समझते ही बन्धन खुल जाता है।

मुक्ति का मार्ग द्वन्द्व भरा है। अनेक कामनाएं बाधा बनती हैं। अधूरी और दबी हुई कामनाएं आमतौर पर विस्फोटक होती हैं। व्यसन-वासनाएं जोर से चिपके रहते हैं। मानो इनके हटने से चमड़ी ही उतर जाएगी। देवासुर संग्राम ही है। मन के प्रवाह पर अंकुश लगाना, कामनाओं से बाहर निकल जाना इन्द्र से युद्ध करना है। इसीलिए इन्द्रिय निग्रह महžवपूर्ण है। किन्तु एक बार मुक्ति की ठान ले तो यही इन्द्र व्यक्ति को सूर्य तक पहुंचा देता है।

गुलाब कोठारी
लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

Friday, April 19, 2013

हल्का भोजन लो और लंबा जीवन जियो


टोक्‍यो। दुनिया का सबसे उम्रदराज शुक्रवार को जापान में 116 वर्ष का हो गया। इस व्यक्ति और इसके आसपास की उम्र तक पहुंच चुके अन्य लोगों के इतने लंबे जीवन जीने का राज पता लगाने के लिए जापान में स्थानीय स्वास्थ्य प्रमुखों ने एक अध्ययन शुरू किया है। 

जिरोएमॉन किमूरा का जन्म 1897 में हुआ था। अपने इस ऐतिहासिक जन्मदिन को किमूरा के अपने परिवार और दोस्तों के साथ ही मनाने की संभावना है। इस अवसर पर देश के पश्चिम में स्थित उनके गृहनगर क्योतांगो शहर के महापौर के आने की भी संभावना है।

इस शहर की जनसंख्या (60 हजार) में किमूरा उन 95 लोगों में से एक हैं, जिन्होंने अपनी जिंदगी के 100 या उससे ज्यादा वर्ष पूरे किए हैं।

एक स्थानीय अधिकारी ने बताया कि जीवन की शती मनाने वाले किमूरा धूम्रपान नहीं करते और वे भोजन तभी तक करते हैं, जब तक कि उनका पेट 80 प्रतिशत भर न जाए। एक स्थानीय रिपोर्ट में कहा गया है कि वे बहुत कम मात्रा में अल्‍कोहल लेते हैं। 

अधिकारी ने बताया कि किमूरा का सिद्धान्त है, 'हल्का भोजन लो और लंबा जीवन जियो'। अधिकारी ने बताया कि यह भी पता लगाया जाएगा कि जो लोग अधिक जीते है, क्या उसके लिए स्थानीय भोजन भी जिम्मेदार है। (भाषा)

Saturday, April 13, 2013

हैनरी फोर्ड

एक युवक ने जब हैनरी फोर्ड से कहा कि "मैं भी हेनरी फोर्ड के समान संपन्न बनना चाहता हूँ । कृपया मेरा मार्गदर्शन कीजिए ।" हैनरी फोर्ड ने जो उत्तर दिया वह हर भौतिक महत्त्वाकांक्षी को प्रेरणा दे सकता है । फोर्ड ने उत्तर दिया, 'किसी भी कीमत पर अपनी प्रामाणिकता बनाए रखो, मनोयोग एवं सतत् श्रम का अवलंबन लेकर व्यवसाय क्षेत्र में आगे बढ़ सकते हो ।’ एक सामान्य से ओटोमोबाइल मैकेनिक के रूप में फोर्ड ने अपने जीवन क्रम का आरंभ किया तथा पुरुषार्थ के सहारे सफलता की चोटी पर जा पहुँचे । फोर्ड को ओटोमोबाइल उद्योग का संस्थापक माना जाता है । मोटर कारखाना की स्थापना के समय उनकी इच्छा थी कि इतनी सस्ती कारों का निर्माण करें कि प्रत्येक कर्मचारी को उपलब्ध हो सके । सन् 1930 में फोर्ड कपंनी से निकलने वाली कार की कीमत मात्र 300 डालर थी । फोर्ड कपंनी के सामने हर समय 70,000 कारें खड़ी रहती थीं जो मात्र कंपनी में कार्य करने वाले कर्मचारियों की थीं, सन् 1937 में मृत्यु के समय हेनरी विश्व के सबसे संपन्न व्यक्ति माने गए । फोर्ड शांति के पक्षपाती थी । उन्होंने फोर्ड फाउंडेशन की स्थापना द्वारा अपने करुण हृदय का परिचय दिया । खरबों डालर की राशि से स्थापित यह संस्था मानवतावादी कार्यों में लगी है ।
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य,
बड़े आदमी नहीं महामानव बनें, पृ. १२"

“Maintain your honesty at any cost and strive in the profession with hard-work and strongly positive attitude”.


Wednesday, March 6, 2013

अनुशासन

अनुशासन का सीधा अर्थ अपने दायरे में रहना है। हमारा जो फर्ज है, जो कर्तव्य है उसे ठीक समय पर पूरा करना और किसी दूसरे के कार्य में दखल न देना ही सही मायने में अनुशासन का पालन करना है। यदि हम अनुशासन का पालन करते हैं, तो हमारी मान-मर्यादा बनी रहती है। इसके विपरीत हम मनमानी पर उतर आएं, तो इसका बुरा नतीजा भुगतना पड़ता है। जीवन में सच्चे संकल्प और अनुशासन से इनसान किस तरह कामयाबी को अपनी मुट्ठी में बंद कर सकता है, इसके लिए अनगिनत मिसालें पेश की जा सकती हैं। महाभारत के प्रसिद्ध पात्र कर्ण का जीवन इस संबंध में सबके लिए अनुकरणीय हो सकता है। दानवीर कर्ण के बचपन का जीवन कितना संघर्ष भरा था, यह तो आप सब लोग जानते हैं। जन्म लेते ही समाज के विरोध का ख्याल कर माता ने नदी में बहा दिया और फिर एक निसंतान दंपति ने उनका पालन-पोषण किया। जन्म से कुलीन होने पर भी ऐसी विवशता रही कि उन्हें सूतपुत्र का विशेषण मिला और आचार्य द्रोण ने शिक्षा देने से इंनकार कर दिया। मगर संकल्प के धनी कर्ण ने अपनी सच्ची लगन और अनुशासन पालन से शास्त्र और शस्त्र विद्या अर्जित की। फिर इसी के बल पर कर्ण ने अपनी अलग पहचान बनाई। वैसे तो महाभारत के नायक के रूप में अर्जुन को जाना जाता है, मगर यह कहना अनुचित नहीं होगा कि कर्ण किसी भी रूप से अर्जुन से कम नहीं। यहां तक कि अर्जुन को श्रीकृष्ण जैसा सारथी न मिला होता तो उनकी विजय यात्रा कभी पूरी नहीं होती। कौरव दल में कर्ण ही एक केवल एकमात्र ऐसे महारथी थे जो अर्जुन को परास्त कर देने की काबिलियत रखते थे। लेकिन अधर्म और अन्याय के समर्थक दुर्योधन के पक्ष में अपना मित्र धर्म निभाने के लिए वह खड़े थे, इसलिए उन्हें कामयाबी नहीं मिल पाई। फिर इतना कुछ होने के बावजूद व्यक्तिगत रूप में कर्ण का चरित्र, उनकी भूमिका उन्हें सम्मान का पात्र बनाती है। यहां इस प्रसंग का जिक्र मैंने इसलिए किया है ताकि आप यह समझ सकें कि इंसान कि असली पहचान कुल, गोत्र,जाति नहीं, इसका कर्म और सच्चे संकल्प से कर्मक्षेत्र में लगातार जुटा रहता है उसे संसार हमेशा सम्मान देता है। उसकी कीर्ति पताका हमेशा लहराती रहती है।  यदि इस मामले में  मैं आज के दौर की बात करूं, तो जीवन के शुरूआती सफर में मेरी भी राम कहानी कुछ ऐसी रही कि यदि संकल्प और अनुशासन की  अहमियत नहीं समझता, तो आज कहीं का नहीं होता। देश के बंटवारे का वह वक्त आज भी मैं चाहकर भी नहीं भूल सकता।  संयम और सादगी की अहमियत को समझें, क्योंकि  इसी के सहारे चरित्र का निर्माण होता है।  खान—पान में संयम,व्यवहार में संयम,  इसका हमारे जीवन की खुशहाली तय करने  में बहुत ही  महत्व है। इसी तरह सादगी में जो सुख है,व्यर्थ के दिखावे से हासिल होने वाले क्षणिक सुख से उसकी तुलना भी नहीं  की जा सकती । सच तो यह है कि सादगी और संयम अपनाने से अपने आप हम अनुशासन करने लगते हैं। और फिर जीवन से  ख्वाब अधूरे नहीं रह पाते। दृढ़ संकल्प और अनुशासन के महत्व को समझने के लिए हमें प्राचीन महापुरुषों की  जीवनगाथाओं का भी मनन करना चाहिए।  जीवनगाथाओं का मनन करने से हमारे मन को बल मिलता है, बुरी आदतें उसे अपना गुलाम नहीं बना पातीं और  अपने संकल्प को  सपनों को पूरा करने के लिए हर हाल में तत्पर रहते हैं। हमें अपने समाज में  भी वैसी हस्तियों से सबक लेना चाहिए, जिन्होंने सच्चाई, ईमानदारी, अनुशासन, परोपकार आदि के बल पर अगली कतार  में बैठने की काबिलियत हासिल की, समाज में अपना नाम रोशन किया।  क्रोध से हमेशा दूरी बनाए रखें, मन को शांत रखें, क्योंकि क्रोध में मन बेकाबू हो जाता है और हम गलत कदम उठा बैठते हैं। पल भर का क्रोध आपका भविष्य बिगाड़ सकता है। यदि कभी क्रोध आए तो  उस समय कोई निर्णय न लें, बल्कि मौन धारण कर लें, शांत हो जाएं। फिर जब मन पूरी तरह शांत हो जाए, तो इस बात का विचार करें कि आपका क्रोध कितना अनर्थ कर सकता था। अपने जीवन को खुशहाल बनाने के लिए पूरे दिन का वक्त के हिसाब से  एक प्रोग्राम तय करें। काम का, आराम का,घूमने का, सोने का  पूजा पाठ का  मगर घबराएं नहीं ,सख्ती से खुद पर लागू करें।