Thursday, August 29, 2013

स्वस्तिक

॥ ॐ स्वस्ति न इंद्रो वृद्ध-श्रवा-हा स्वस्ति न-ह पूषा विश्व-वेदा-हा।
स्वस्ति न-ह ताक्षर्‌यो अरिष्ट-नेमि-हि स्वस्ति नो बृहस्पति-हि-दधातु॥

अर्थात : महान कीर्ति वाले इन्द्र हमारा कल्याण करो, विश्व के ज्ञानस्वरूप पूषादेव हमारा कल्याण करो। जिसका हथियार अटूट है ऐसे गरूड़ भगवान हमारा मंगल करो। बृहस्पति हमारा मंगल करो।

स्वस्तिक का आविष्कार आर्यों ने किया और पूरे विश्‍व में यह फैल गया। आज स्वस्तिक का प्रत्येक धर्म और संस्कृति में अलग-अलग रूप में इस्तेमाल किया गया है। कुछ धर्म, संगठन और समाज ने स्वस्तिक को गलत अर्थ में लेकर उसका गलत जगहों पर इस्तेमाल किया है तो कुछ ने उसके सकारात्मक पहलू को समझा।

स्वस्तिक को भारत में ही नहीं, अपितु विश्व के अन्य कई देशों में विभिन्न स्वरूपों में मान्यता प्राप्त है। जर्मनी, यूनान, फ्रांस, रोम, मिस्र, ब्रिटेन, अमेरिका, स्कैण्डिनेविया, सिसली, स्पेन, सीरिया, तिब्बत, चीन, साइप्रस और जापान आदि देशों में भी स्वस्तिक का प्रचलन किसी न किसी रूप में मिलता है।

स्वस्तिक शब्द को 'सु' एवं 'अस्ति' का मिश्रण योग माना जाता है। 'सु' का अर्थ है शुभ और 'अस्ति' का अर्थ है- होना। अर्थात 'शुभ हो', 'कल्याण हो'। स्वस्तिक अर्थात कुशल एवं कल्याण।

हिंदू धर्म में स्वस्तिक को शक्ति, सौभाग्य, समृद्धि और मंगल का प्रतीक माना जाता है। हर मंगल कार्य में इसको बनाया जाता है। स्वस्तिक का बायां हिस्सा गणेश की शक्ति का स्थान 'गं' बीजमंत्र होता है। इसमें जो चार बिंदियां होती हैं, उनमें गौरी, पृथ्वी, कच्छप और अनंत देवताओं का वास होता है।

इस मंगल-प्रतीक का गणेश की उपासना, धन, वैभव और ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी के साथ, बही-खाते की पूजा की परंपरा आदि में विशेष स्थान है। इसकी चारों दिशाओं के अधिपति देवताओं, अग्नि, इन्द्र, वरुण एवं सोम की पूजा हेतु एवं सप्तऋषियों के आशीर्वाद को प्राप्त करने में प्रयोग किया जाता है। यह चारों दिशाओं और जीवन चक्र का भी प्रतीक है।

घर के वास्तु को ठीक करने के लिए स्वस्तिक का प्रयोग किया जाता है। स्वस्तिक के चिह्न को भाग्यवर्धक वस्तुओं में गिना जाता है। स्वस्तिक के प्रयोग से घर की नकारात्मक ऊर्जा बाहर चली जाती है।
जैन धर्म के चौबीस तीर्थंकर और उनके चिह्न में स्वस्तिक को शामिल किया गया है। तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ का शुभ चिह्न है स्वस्तिक जिसे साथिया या सातिया भी कहा जाता है।

जैन धर्म के प्रतीक चिह्न में स्वस्तिक को प्रमुखता से शामिल किया गया है। स्वस्तिक की चार भुजाएं चार गतियों- नरक, त्रियंच, मनुष्य एवं देव गति की द्योतक हैं। जैन लेखों से संबंधित प्राचीन गुफाओं और मंदिरों की दीवारों पर भी यह स्वस्तिक प्रतीक अंकित मिलता है।

यहूदी और ईसाई धर्म में भी स्वस्तिक का महत्व है। ईसाई धर्म में स्वस्तिक क्रॉस के रूप में चिह्नित है। एक ओर जहां ईसा मसीह को सूली यानी स्वस्तिक के साथ दिखाया जाता है तो दूसरी ओर यह ईसाई कब्रों पर लगाया जाता है। स्वस्तिक को ईसाई धर्म में कुछ लोग पुनर्जन्म का प्रतीक मानते हैं।
प्राचीन यूरोप में सेल्ट नामक एक सभ्यता थी, जो जर्मनी से इंग्लैंड तक फैली थी। वे स्वस्तिक को सूर्यदेव का प्रतीक मानते थे। उनके अनुसार स्वस्तिक यूरोप के चारों मौसमों का भी प्रतीक था। बाद में यह चक्र या स्वस्तिक ईसाइयत ने अपनाया। ईसाइयत में स्वस्तिक पुनर्जन्म का प्रतीक भी माना गया है।

मिस्र और अमेरिका में स्वस्तिक का काफी प्रचलन रहा है। इन दोनों जगहों के लोग पिरामिड को पुनर्जन्म से जोड़कर देखा करते थे। प्राचीन मिस्र में ओसिरिस को पुनर्जन्म का देवता माना जाता था और हमेशा उसे चार हाथ वाले तारे के रूप में बताने के साथ ही पिरामिड को सूली लिखकर दर्शाते थे।

इस तरह हम देखते हैं कि स्वस्तिक का प्रचलन प्राचीनकाल से ही हर देश की सभ्यताओं में प्रचलित रहा है। स्वस्तिक को किसी एक धर्म का नहीं मानकर इसे प्राचीन मानवों की बेहतरीन खोज में से एक माना जाना चाहिए।

Friday, August 16, 2013

अपने स्वभाव को बनाएं प्रकृति के अनुकूल



किसी मनुष्य को जो होना चाहिए और वह जो है, उसके बीच में सदा फर्क रहा है। मनुष्य 'जैसा है' को 'जैसा होना चाहिए' के नजदीक लाने का जो प्रयास करता है वही उसका आध्यात्मिक विकास है।

अतः पहला सवाल यह है कि मनुष्य को कैसा होना चाहिए? इसके साथ जुड़ा सवाल यह है कि धरती पर मनुष्य के जीवन का मूल उद्देश्य क्या है? इस उद्देश्य के अनुरूप ही मनुष्य का जीवन होना चाहिए।

पृथ्वी पर लाखों किस्म के जीव हैं। जीवन लाखों रूप में धरती पर प्रकट हुआ है। पर इन लाखों जीवन रूपों में मनुष्य ही एकमात्र ऐसा जीव है जो नियोजित ढंग से अन्य जीवों की रक्षा के उपाय करने में सक्षम है। इस क्षमता से ही मनुष्य का धरती पर मूल लक्ष्य निर्धारित होता है।

मनुष्य का मूल उद्देश्य सभी मनुष्यों सहित अन्य सभी जीवों की रक्षा करना है व दुख-दर्द कम करना है। इस तरह मनुष्य की मूल भूमिका रक्षक की है। आज की ही नहीं, आने वाली पीढ़ियों के जीवन की रक्षा के बारे में उसे सोचना है और उसमें यह सामर्थ्य भी है, यह योग्यता भी है। अतः मनुष्य को मूलतः एक रक्षक का जीवन जीना चाहिए। क्या ही अच्छा होता यदि इस भूमिका के अनुकूल स्वभाव प्राकृतिक रूप से सभी मनुष्यों को मिल जाता है। यदि ऐसा होता तो सभी मनुष्य रक्षक की भूमिका निभाते और एक दूसरे के दुख-दर्द के सच्चे हितैषी होते।

इस स्थिति में पृथ्वी पर सभी जीवों को पनपने का भरपूर अवसर मिलता। पर्यावरण की पूरी रक्षा होती व भावी पीढ़ियों के मनुष्यों और अन्य जीवों की जरूरतों का भी पूरा ध्यान रखा जाता। पर अफसोस कि मनुष्य को उसके अनुकूल स्वभाव प्राकृतिक रूप से नहीं मिलता है। यह उसे धीरे-धीरे विकसित करना पड़ता है। अतः अपने जीवन को मनुष्य के मूल उद्देश्य के नजदीक ले जाने का प्रयास करते रहना ही आध्यात्मिक विकास है।

चाहे यह सफर धीरे-धीरे ही तय हो, चाहे भटकाव के मौके भी आए, चाहे सफलता कम मिले, पर जब तक कोई व्यक्ति सच्ची भावना से मनुष्य के वास्तविक लक्ष्य की ओर बढ़ने का प्रयास कर रहा है तो वह आध्यात्मिक विकास पर अग्रसर है।

मनुष्य को अपनी जरूरतों के अनुकूल विश्व से ग्रहण करना चाहिए व इससे आगे कोई लालसा नहीं करना चाहिए। यही सादगी का जीवन है। इस सादगी को अपनाए बिना मनुष्य रक्षक की भूमिका नहीं निभा सकता है।

जब तक उसकी लालसा अपने लिए निरंतर अधिक प्राप्त करने की बनी रहती है, तब तक वह अन्य मनुष्यों व अन्य जीवों का हितैषी नहीं बन सकता क्योंकि वह उसके हिस्सा भी छीनना चाहता है। पर जैसे ही वह सादगी अपनाकर अपनी आवश्यकताओं को समेट लेता है, वैसे ही उसके लिए रक्षक की मूल भूमिका निभाना संभव हो जाता है। इस प्रकार यह प्रयास ही आध्यात्मिक विकास है।

Thursday, July 18, 2013

वैदिक प्रश्नोत्तरी


स्वामी जी इस सृष्टि का स्वामी एवं नियंता कौन है? इस सृष्टि में प्रथम कौन आया?
इस सृष्टि का स्वामी एवं नियंता स्वयं सर्वशक्तिमान निराकार, सर्वव्यापक ईश्वर है जो सृष्टि का रचयिता, पालनकर्ता एवं संहारकर्ता है। सृष्टि रचना नित्य एवं शाश्वत है। जीवात्मा का स्वरूप भी नित्य एवं शाश्वत है तथा जीवात्माएं अपने द्वारा किए हुए शुभ एवं अशुभ कर्मों के आधार पर ही शरीर धारण करती हैं। इसके अतिरिक्त जड़-प्रकृति, जिसके द्वारा संपूर्ण जड़ ब्रह्मांड की रचना होती है, वह भी नित्य एवं शाश्वत है। अतः चेतन ईश्वर, चेतन जीवात्माएं एवं जड़ प्रकृति, ये नित्य एवं शाश्वत तीन विषय हैं, जिनके बारे में वेदों में वर्णन किया गया है। यही वेदों में कहा त्रैतवाद है। अतः इस आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि प्रथम कौन आया, क्योंकि सृष्टि रचना का न कोई आदि है और न कोई अंत। पृथवी बनती है, नष्ट होती है और पुनः बन जाती है।

भगवद् गीता किस की रचना है?
श्रीमद्भगवद् गीता महाभारत ग्रंथ के भीष्म पर्व के 18 अध्याय हैं जो व्यासमुनि द्वारा रचित हैं। मैं आपको सलाह देता हूं कि आप ईश्वर कृपा से मेरे द्वारा रचित ‘श्रीमद्भगवद् गीता – एक वैदिक रहस्य’ का अध्ययन करें।

वेद एवं ईश्वर के ज्ञाता ब्राह्मण को दान क्यों दिया जाता है?
यजुर्वेद मंत्र 31/11 के अनुसार वेद एवं ईश्वर के ज्ञाता को ब्राह्मण कहते हैं और धर्म स्थापना के लिए इन्हें दान दिया जाता है। नट-नर्तकों को यश के लिए, सेवकों को भरण-पोषण और राजाओं को भय के कारण दान दिया जाता है।

ज्ञान किसे कहते हैं?
वेद ही ज्ञान है। वेदाध्ययन, वेदानुसार शुभ-कर्म एवं योग-साधन द्वारा परमात्म तत्त्व का यथार्थ बोध ही ज्ञान है।

शम क्या कहलाता है?
चित्त की शांति ही शम है।

मनुष्य का दुर्जय शत्रु कौन सा है?
क्रोध मनुष्य का दुर्जय शत्रु है।

अनंत व्याधि (अनंत दुख) क्या है?
लोभ अनंत व्याधि है?

मोह किसे कहते हैं?
धर्म मूढ़ता (कर्त्तव्य पालन न करना) ही मोह है।

स्वामी जी वेद किसने लिखे हैं?
वेद ऋषि, मुनि, मनुष्य आदि किसी ने भी नहीं लिखे हैं। वेद का अर्थ है ज्ञान। यजुर्वेद मंत्र 7/4 में स्पष्ट किया है कि यह ज्ञान पृथ्वी रचना के आरंभ में ईश्वर से निकलकर अमैथुनी सृष्टि के चार ऋषियों के हृदय में ईश्वर की सामर्थ्य से प्रकट होता है। हम मनुष्य हैं, हमें कागज, कलम आदि का सहारा चाहिए। ईश्वर सर्वशक्तिमान है, अतः उसे कागज, कलम, दवात अथवा आंख, नाक, हाथ आदि के सहारे की आवश्यकता नहीं है। इसलिए वेद का ज्ञान बिना बोले और बिना लिखें इन ऋषियों में प्रकट होता है।
वृद्ध कौन है?
मनु-स्मृति श्लोक 2/128 में कहा-चाहे कोई 100 वर्ष की आयु का भी हो परंतु जो विद्या विज्ञान से रहित है वह बालक है और जो विद्या विज्ञान का दाता है उस बालक को भी पिता के  समान मानना चाहिए। क्योंकि विद्वान जन अज्ञानी को बालक और ज्ञानी को पिता कहते हैं। ऋग्वेद मंत्र 5/43/15 में भी कहा है कि जो वेद और योग-विद्या के ज्ञान से शुद्ध बुद्धि प्राप्त करते हैं तथा सदा श्रेष्ठ शुभ कर्म ही करते हैं, उन्हें भी वृद्ध अथवा विद्वान कहते हैं।

Monday, June 17, 2013

।। मां गायत्री चालीसा ।।


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ह्रीं श्रीं क्लीं मेधा प्रभा जीवन ज्योति प्रचंड ॥
शांति कांति जागृत प्रगति रचना शक्ति अखंड ॥1॥
जगत जननी मंगल करनि गायत्री सुखधाम ।
प्रणवों सावित्री स्वधा स्वाहा पूरन काम ॥ २॥
भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी ।
गायत्री नित कलिमल दहनी ॥॥
अक्षर चौबीस परम पुनीता ।
इनमें बसें शास्त्र श्रुति गीता ॥॥
शाश्वत सतोगुणी सत रूपा ।
सत्य सनातन सुधा अनूपा ॥॥
हंसारूढ श्वेतांबर धारी ।
स्वर्ण कांति शुचि गगन-बिहारी ॥॥
पुस्तक पुष्प कमंडलु माला ।
शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला ॥॥
ध्यान धरत पुलकित हित होई ।
सुख उपजत दुख दुर्मति खोई ॥॥
कामधेनु तुम सुर तरु छाया ।
निराकार की अद्भुत माया ॥॥
तुम्हरी शरण गहै जो कोई ।
तरै सकल संकट सों सोई ॥॥
सरस्वती लक्ष्मी तुम काली ।
दिपै तुम्हारी ज्योति निराली ॥॥
तुम्हरी महिमा पार न पावैं ।
जो शारद शत मुख गुन गावैं ॥॥
चार वेद की मात पुनीता ।
तुम ब्रह्माणी गौरी सीता ॥॥
महामंत्र जितने जग माहीं ।
कोउ गायत्री सम नाहीं ॥॥
सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै ।
आलस पाप अविद्या नासै ॥॥
सृष्टि बीज जग जननि भवानी ।
कालरात्रि वरदा कल्याणी ॥॥
ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते ।
तुम सों पावें सुरता तेते ॥॥
तुम भक्तन की भक्त तुम्हारे ।
जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे ॥॥
महिमा अपरम्पार तुम्हारी ।
जय जय जय त्रिपदा भयहारी ॥॥
पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना ।
तुम सम अधिक न जगमें आना ॥॥
तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा ।
तुमहिं पाय कछु रहै न क्लेसा ॥॥
जानत तुमहिं तुमहिं व्है जाई ।
पारस परसि कुधातु सुहाई ॥॥
तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई ।
माता तुम सब ठौर समाई ॥॥
ग्रह नक्षत्र ब्रह्मांड घनेरे ।
सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे ॥॥
सकल सृष्टि की प्राण विधाता ।
पालक पोषक नाशक त्राता ॥॥
मातेश्वरी दया व्रत धारी ।
तुम सन तरे पातकी भारी ॥॥
जापर कृपा तुम्हारी होई ।
तापर कृपा करें सब कोई ॥॥
मंद बुद्धि ते बुधि बल पावें ।
रोगी रोग रहित हो जावें ॥॥
दरिद्र मिटै कटै सब पीरा ।
नाशै दुख हरै भव भीरा ॥॥
गृह क्लेश चित चिंता भारी ।
नासै गायत्री भय हारी ॥॥
संतति हीन सुसंतति पावें ।
सुख संपति युत मोद मनावें ॥॥
भूत पिशाच सबै भय खावें ।
यम के दूत निकट नहिं आवें ॥॥
जो सधवा सुमिरें चित लाई ।
अछत सुहाग सदा सुखदाई ॥॥
घर वर सुख प्रद लहैं कुमारी ।
विधवा रहें सत्य व्रत धारी ॥॥
जयति जयति जगदंब भवानी ।
तुम सम ओर दयालु न दानी ॥॥
जो सतगुरु सो दीक्षा पावे ।
सो साधन को सफल बनावे ॥॥
सुमिरन करे सुरूचि बडभागी ।
लहै मनोरथ गृही विरागी ॥॥
अष्ट सिद्धि नवनिधि की दाता ।
सब समर्थ गायत्री माता ॥॥
ऋषि मुनि यती तपस्वी योगी ।
आरत अर्थी चिंतित भोगी ॥॥
जो जो शरण तुम्हारी आवें ।
सो सो मन वांछित फल पावें ॥॥
बल बुधि विद्या शील स्वभाउ ।
धन वैभव यश तेज उछाउ ॥॥
सकल बढें उपजें सुख नाना ।
जे यह पाठ करै धरि ध्याना ॥
यह चालीसा भक्ति युत पाठ करै जो कोई ।
तापर कृपा प्रसन्नता गायत्री की होय ॥

Sunday, April 21, 2013

अगर सभी अपने घर के बाहर की सफाई करें तो सारी दुनिया साफ हो जाएगी


जर्मन साफ सुथरे माने जाते हैं। भले ही वह स्विस लोगों जितने साफ नहीं हों, लेकिन वह एकदम चकाचक देशों में शामिल है। पत्रकार पेटर सूडाइक इसे जर्मनों की दीवानगी बताते हैं।


दुनिया में आम तौर पर स्विटजरलैंड सबसे साफ देश माना जाता है। इसकी सड़कें इतनी साफ होती हैं कि आप उस पर खाना रख कर खा लें। अपने पेड़ों की हमेशा काट छाट करने वाले, पहाड़ियों की चोटी साफ करने वाले और घरों के बाहर झाड़ू बुहार करने वालों से जर्मन टक्कर लें तो कैसे? या हम ऐसा कह सकते हैं कि सफाई के मामले में स्विस लोग जर्मन लोगों का चरमपंथी संस्करण हैं। हमें अपनी उपलब्धियों को दूसरों की सफाई की छाया में छिपने देने की जरूरत नहीं।

मैं योहान वोल्फगांग गोएथे को अपने पहले सबूत के तौर पर पेश करता हूं। 'सभी अगर अपने घर के बाहर की सफाई करें तो सारी दुनिया साफ हो जाएगी।' और एक बार उन्होंने कहा था कि यह सिर्फ कहावत नहीं बल्कि जर्मन अस्मिता का मुख्य सच है।

एक ओर तो वह ये कहते हैं कि आप अपना कचरा खुद साफ करें और दूसरे के काम में दखल न दें। लेकिन दूसरी ओर शायद उन्होंने यह भी कहा हो सकता है कि जर्मनों को साफ सफाई करना पसंद है। जैसा कि जर्मनी के दर्शनशास्त्री ऑटो फ्रीडरिष बोलनाऊ ने कहा था, 'जब व्यापारियों ने अपनी दुकान खोल ली हो, जब घर की औरतों ने घर को एकदम चकाचक साफ कर दिया हो और घर के सामने की सड़क भी बुहार दी हो तब जा कर लोगों को चैन की सांस आती है।'

यही सोच जर्मनी के अधिकतर इलाकों में है और कुछ इलाकों में तो बहुत ही ज्यादा, जैसे कि स्वेबिया में। यहां साफ-सफाई के लिए एक हफ्ते का सिस्टम है, केहरवोखे। यह अपार्टमेंट में चलने वाला सिस्टम है जहां हर मकान वाले की सीढ़ियां, सेलर और बाहर के रास्ता साफ करने की एक-एक बार जिम्मेदारी आती है। सबको पता होता है कि किस हफ्ते किसकी बारी है और सब पूरी कोशिश करते हैं कि वो टाइमटेबल से चलें। अधिकतर यह आराम से चलता रहता है।

हालांकि...सिर्फ सड़कें ही नहीं चमकती बल्कि कपड़े भी एकदम साफ बेदाग होने चाहिए। जब मैं बड़ा हो रहा था तब भले ही मेरे मोजे रफू करने की स्थिति तक पहुंच जाएं उन्हें रोजाना धोया जाता था। मेरी मां की पूरी कोशिश होती कि भगवान न करे कि कभी मेरा एक्सीडेंट हो जाए और मुझे ऑपरेशन टेबल पर जाना पड़े तो मेरी अंडरवीयर गंदी न हो।

अब बीयर, इसे भी जर्मन शुद्धता कानून पर खरा उतरना बहुत जरूरी है। हमें सफाई अंकों में भी बहुत पसंद है। 13 वीं सदी के एक जर्मन कवि ने, जो स्वेबिया के थे, लिखा था, 'जहां भी सूरज की रोशनी पड़ती है, सूरज की रोशनी सब शुद्घ करती है। भले ही जो भी पादरी हो, सभा हमेशा शुद्ध होती है। सभा और सूरज की रोशनी हमेशा शुद्ध होती है।'

हम जर्मनों का विश्वास है कि जब मामला शुद्धता और सफाई का हो तो इसे सीखने की कोई उम्र नहीं होती। टॉयलेट से जुड़ी ट्रेनिंग जर्मन में राइनलिषकाइट्सएरजीहुंग कहलाती है, यानी साफ सफाई की शिक्षा। तो फिर अब तुरंत हाथ धोइए...

लेख: पेटर सूडाइक/आभा मोंढे 
संपादन: महेश झा

मुक्ति

अनन्त आवरणों में बन्धा हुआ जीव मुक्ति की कामना करे, छटपटाए यह तो समझ में आता है, किन्तु मुक्त व्यक्ति पहले स्वयं को बान्धे, बान्धता ही चला जाए और साथ-साथ मुक्ति की कामना करता रहे, यह समझ में नहीं आता। यह आज के मानव की तस्वीर है, जो यह सिद्ध कर रही है कि मानव-देह सृष्टि के लिए अति विशिष्ट योनि है। 

मानव की स्वतंत्र बुद्धि, शरीर की स्वतंत्रता और ज्ञान का अहंकार ही सृष्टि की अन्य योनियों के विकास एवं उनकी निरन्तरता के लिए उत्तरदायी है। वही अपने कर्म-फलों के अनुरूप विभिन्न योनियों को प्राप्त होता रहा है। अन्य योनियों को, जिसमें देवयोनि भी सम्मिलित हैं, भोग योनियां कहा है। वे अपना नया कर्म करने को स्वतंत्र नहीं हैं। यही मानव योनि की विशेषता है।

मानव देह भी कर्म-फल के रूप में ही प्राप्त होती है। इसमें व्यक्ति पुराने कर्मो के फल भी भोगता है और नए कर्म भी अर्जित करता है। विद्या और अविद्या ही कर्मो का आधार होता है। ज्ञान और कर्म के पर्याय हैं। जब जीवन की सारी गतिविधियां अन्नमय, प्राणमय और मनोमय कोश के भीतर चलती हैं, तब उनको कर्म कहते हैं। 

जब इनका कार्य क्षेत्र मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय कोश होता है, तब ज्ञान या विद्या के रूप में जाना जाता है। कर्म के साथ बन्धन का सीधा सम्बन्ध है और विद्या मुक्ति का मार्ग है। आत्मा के पास ये दो ही विकल्प हैं।

बन्धन के मूल में अहंकार रहता है। इसका केन्द्र अहंकृति है। इसी के अनुरूप प्रकृति होती है। प्रकृति का प्रतिबिम्ब आकृति होती है। जैसे-जैसे प्रकृति बदलती जाती है, वैसे-वैसे ही अगले जन्मों की आकृति तय होती जाती है। अन्त समय जब व्यक्ति देहातीत होकर समाधि ग्रहण करता है, तब सभी आकृतियों से मुक्त हो जाता है। कालातीत हो जाती है।

व्यक्ति का अहंकार अपने से कमजोर व्यक्ति के अधिकारों का हनन या अतिक्रमण करता रहता है। इसी क्रम में वह स्वयं को बन्धनों में जकड़ता ही चला जाता है। घर में एक नौकर रखकर हम सोचते हैं कि बहुत कुछ हल्के हो गए। होता बिल्कुल उल्टा है। हम स्वयं उससे बन्ध जाते हैं। हर पल उसके कार्यो पर ही आंखें टिकी रहती हैं। उसकी भाषा एवं उसके व्यवहार की चर्चा, उसके अज्ञान और अनाड़ीपन की चर्चा हमारे जीवन का बड़ा हिस्सा घेर लेती है। 

इतनी चर्चा न तो पति-पत्नी एक दूसरे की करते हैं। न ही बच्चों के बारे में एक-एक शब्द का आकलन होता है। बल्कि नौकर की चर्चा से स्वामी का अभिमान ही बढ़ता जाता है। उसकी/ उनकी भाषा में भी हल्कापन प्रवेश कर जाता है। नौकर नहीं हो तो स्वामी कैसा? अहंकार किसका? अज्ञान का आग्रह रहता है कि कर्म योग से बाहर रहना ही समृद्धि का प्रमाण-पत्र है।

अहंकार ही राग-द्वेष का सूत्रधार है। आसक्ति आंखों पर चढ़ी पट्टी है। खुली आंखों पर। जीवन के सारे सम्बन्ध ही बन्ध हैं। सम्+बन्ध। जन्म लिया है तो समाज के बन्ध भी रहेंगे। हालांकि, प्रकृति में कोई बन्ध नहीं है। हम अपने ही कर्म बन्धनों को प्रकृति का नाम दे देते हैं। जैसे कि शादियां तो स्वर्ग में ही तय हो जाती हंै। जैसे कि स्वर्ग हमको बान्धना चाहता हो।

या "शादी तो सात जन्म साथ रहने का मार्ग है।" साथ ही यह भी कहते हैं कि यह तो हमारा सातवां जन्म है। गले तक भर गए हैं, अब मुक्त होना चाहते हैं। ऎसा बन्धन आगे और नहीं चाहिए। सच पूछो तो यही मुक्ति द्वार है। इतनी विरक्ति हो जाना, कि पीछे मुड़कर देखने की इच्छा भी मर जाए, ग्रन्थि बंधन के खुलने की शुरूआत है। कितनी शक्ति लगाई होगी दोनों ने, दूर होने के लिए। कितने आरोप जड़े होंगे, कितना अविश्वास जताया होगा, अपने बन्धन में! कुछ तानों की नित्य बौछार भी साथ बनी रहती है, ताकि स्मृतियां भी उसको लौटा न लाएं। ये कैसा मुक्ति बोध! 

बन्धन तो इच्छा का नाम है। मुक्त हो पाना कैसे संभव है। इच्छा के साथ ही मन पैदा हो जाता है। मन के होते ही विद्या-अविद्या के मार्ग सामने आ जाते हैं। हर सम्बन्ध को सामने देखकर कोई न कोई कामना-भावना मन में उठने लगती है। इस बन्धन से मुक्ति, हर ऎसे बन्धन से मुक्ति, जिनको देखकर मन प्रसन्न होता है, उनके बन्धन से भी मुक्ति। 

हम जिन पर रौब मारते हैं, आदेश देकर जिनकी स्वतंत्रता छीनते हैं, उनसे भी मुक्ति। आखिर यहां भी हम स्वयं को उनका अधिकारी ही मानते हैं। कोई भी कामना जब धारणा बन जाती है, संकल्प बनकर जीवन का अंग बन जाती है, तब उससे मुक्त होना और भी कठिन हो जाता है। जिन-जिन सम्बन्धों के रूप में, प्रेम या घृणा में अपने मन की सिलाई कर ली जाए, संयोग-मिलन-बिछोह पर भीतर आन्दोलन होते रहे हैं, उनसे तो कैसी मुक्ति!

कितना दुलार करते हैं हम शरीर को। पूरी उम्र की मेहनत की कमाई खर्चते हैं, जिस शरीर के सुख और आराम के लिए, मौज-मस्ती के लिए, मनोरंजन और व्यसनों के लिए, जिसको स्वस्थ रखने के लिए, छोड़ दे उसका ख्याल? जो करता है प्रेम अनेक को और अनेक करते हों प्रेम जिसको, जिसका स्पर्श मात्र पैदा कर देता है स्पन्दन दिलों में, जिसके भीतर बैठा हूं मैं स्वयं और खो जाऊंगा उसके बाद, उससे मुक्ति का अर्थ? जिन श्वासों के सहारे मैं जिन्दा हूं, मेरा शरीर खड़ा है, मैं पृथ्वी और सूर्य से निरन्तर जुड़ा हुआ हूं, मेरे मन में कामना पैदा होती है, उनसे मुक्त होने की बात मन में उठ भी कैसे सकती है।

बन्धन ही निर्माण है। जोड़ना है। धन है-अमानत है-परिणाम है। इसी के लिए तो व्यक्ति जीता है। चिनाई को ही बन्ध कहते हैं। चाहें शरीर में पंच महाभूतों की हो, विचारों की हो अथवा भावना की। विचारों को छोड़ पाना तो बहुत ही कठिन है। व्यक्ति इन्हीं के सहारे आदान-प्रदान करता है, संवाद करता है, समाज में अपनी पहचान बनाता है। सबसे महžवपूर्ण बात यह है कि वह अपने अहंकार की तुष्टि करता है। जीवन के उपक्रम साध्य करता है।

विचारों के माध्यम से ही शब्द-ब्रह्म की प्रतिष्ठा होती है। उपासना और अनुष्ठान होते हैं। मंत्र शक्ति से जुड़ता है। अपने इष्ट की आराधना करता है। भावी सपने बुनता है। धर्म और अर्थ के क्षेत्र में मोक्ष की तलाश करता रहता है। तब इस के मानसिक स्वरूप से विच्छेद कर पाना साक्षात् मृत्यु ही है। वैसे तो चेतना के जागरण बिना भी जीवन तो मृत्यु ही है। चेतना का जागरण होता है संकल्प से, विद्या से। यही मुक्ति मार्ग का पहला सोपान है। यहीं से ऊध्र्व यात्रा शुरू होती है। 

विद्या के धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऎश्वर्य से अविद्या, अस्मिता, आसक्ति, अभिनिवेश से मुक्ति मिलती है। शरीर की अनावश्यक क्रियाओं में ठहराव आता है। श्वास लयबद्ध होने लगती है। मन का बाहरी सम्बन्ध भी घटने लगता है। इन्द्रियां भीतर मुड़ने को तत्पर रहती हैं। इसका अर्थ यही है कि शरीर का मोह छूटने लगता है। सौन्दर्य और स्वास्थ्य से जुड़े प्रश्न गौण होने लगते हैं। तब श्वास भी स्वत: ही मन्द पड़ने लगती है। मुक्त होने का यह प्रथम प्रयास है। साथ ही यह भी निश्चित है कि जब तक प्रयास है, हम मुक्त नहीं है। मन शरीर एवं बुद्धि से बन्धा है। प्रयास रहित सहजता ही मुक्ति है। 

शरीर के साथ ही इससे जुडे सम्बन्धों का संयोग भी विदा होने लगता है। वास्तव में तो व्यक्ति अपना यात्रा पथ देखने लग जाता है। उसका भावी लक्ष्य मुखरित हो जाता है। अतीत भी स्पष्ट हो जाता है। तब एक संकल्प का उदय होता है अथवा पुराने को ही बार-बार दोहराया जाता है। एक-एक बन्धन को समझता जाता है। समझ लेना ही ग्रन्थि मोचन है। जैसे रस्सी में लगी गांठ। उसको समझते ही बन्धन खुल जाता है।

मुक्ति का मार्ग द्वन्द्व भरा है। अनेक कामनाएं बाधा बनती हैं। अधूरी और दबी हुई कामनाएं आमतौर पर विस्फोटक होती हैं। व्यसन-वासनाएं जोर से चिपके रहते हैं। मानो इनके हटने से चमड़ी ही उतर जाएगी। देवासुर संग्राम ही है। मन के प्रवाह पर अंकुश लगाना, कामनाओं से बाहर निकल जाना इन्द्र से युद्ध करना है। इसीलिए इन्द्रिय निग्रह महžवपूर्ण है। किन्तु एक बार मुक्ति की ठान ले तो यही इन्द्र व्यक्ति को सूर्य तक पहुंचा देता है।

गुलाब कोठारी
लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

Friday, April 19, 2013

हल्का भोजन लो और लंबा जीवन जियो


टोक्‍यो। दुनिया का सबसे उम्रदराज शुक्रवार को जापान में 116 वर्ष का हो गया। इस व्यक्ति और इसके आसपास की उम्र तक पहुंच चुके अन्य लोगों के इतने लंबे जीवन जीने का राज पता लगाने के लिए जापान में स्थानीय स्वास्थ्य प्रमुखों ने एक अध्ययन शुरू किया है। 

जिरोएमॉन किमूरा का जन्म 1897 में हुआ था। अपने इस ऐतिहासिक जन्मदिन को किमूरा के अपने परिवार और दोस्तों के साथ ही मनाने की संभावना है। इस अवसर पर देश के पश्चिम में स्थित उनके गृहनगर क्योतांगो शहर के महापौर के आने की भी संभावना है।

इस शहर की जनसंख्या (60 हजार) में किमूरा उन 95 लोगों में से एक हैं, जिन्होंने अपनी जिंदगी के 100 या उससे ज्यादा वर्ष पूरे किए हैं।

एक स्थानीय अधिकारी ने बताया कि जीवन की शती मनाने वाले किमूरा धूम्रपान नहीं करते और वे भोजन तभी तक करते हैं, जब तक कि उनका पेट 80 प्रतिशत भर न जाए। एक स्थानीय रिपोर्ट में कहा गया है कि वे बहुत कम मात्रा में अल्‍कोहल लेते हैं। 

अधिकारी ने बताया कि किमूरा का सिद्धान्त है, 'हल्का भोजन लो और लंबा जीवन जियो'। अधिकारी ने बताया कि यह भी पता लगाया जाएगा कि जो लोग अधिक जीते है, क्या उसके लिए स्थानीय भोजन भी जिम्मेदार है। (भाषा)