Thursday, July 25, 2019

प्याले में समुद्र

यूनानी दार्शनिक सुकरात समंदर के किनारे टहल रहे थे। उनकी नजर रेत पर बैठे एक अबोध बालक पर पड़ी, जो रो रहा था। सुकरात ने रोते हुए बालक का सिर सहलाते हुए उससे रोने का कारण पूछा। बालक ने कहा, ‘यह जो मेरे हाथ में प्याला है, इसमें मैं समुद्र के सारे पानी को भरना चाहता हूं, किंतु यह मेरे प्याले में समाता ही नहीं।’ बालक की बात सुनकर सुकरात की आंखों में आंसू आ गए।

सुकरात को रोता देख, रोता हुआ बालक शांत हो गया और चकित होकर पूछने लगा, ‘आप भी मेरी तरह रोने लगे, पर आपका प्याला कहां है?’ सुकरात ने जवाब दिया, ‘बच्चे, तू छोटे से प्याले में समुद्र भरना चाहता है, और मैं अपनी छोटी सी बुद्धि में संसार की तमाम जानकारियां भरना चाहता हूं।’ बालक को सुकरात की बातें कितनी समझ में आईं यह तो पता नहीं, लेकिन दो पल असमंजस में रहने के बाद उसने अपना प्याला समंदर में फेंक दिया और बोला, ‘सागर यदि तू मेरे प्याले में नहीं समा सकता, तो मेरा प्याला तो तेरे में समा सकता है।’

बच्चे की इस हरकत ने सुकरात की आंखें खोल दीं। उन्हें एक कीमती सूत्र हाथ लग गया था। सुकरात ने दोनों हाथ आकाश की ओर उठाकर कहा, ‘हे परमेश्वर, आपका असीम ज्ञान व आपका विराट अस्तित्व तो मेरी बुद्धि में नहीं समा सकता, किंतु मैं अपने संपूर्ण अस्तित्व के साथ आपमें जरूर लीन हो सकता हूं।’

दरअसल, सुकरात को परमात्मा ने बालक के माध्यम से ज्ञान दे दिया। जिस सुकरात से मिलने के लिए बड़े-बड़े विद्वानों को समय लेना पड़ता था, उसे एक अबोध बालक ने परमात्मा का मार्ग बता दिया था। असलियत में परमात्मा जब आपको अपनी शरण में लेता है, यानि जब आप ईश्वर की कृपादृष्टि के पात्र बनते हैं तो उसकी एक खास पहचान यह है कि आपके अंदर का ‘मैं’ मिट जाता है। आपका अहंकार ईश्वर के अस्तित्व में विलीन हो जाता है।

‘मैं-पन’ का भाव छूटते ही हमारे समस्त प्रकार के पूर्वाग्रह, अपराधबोध, तनाव, व्यग्रता और विकृतियों का ईश्वरीय चेतना में रूपांतरण हो जाता है। दरअसल, हरेक व्यक्ति को कई बार अपने जीवन में परमात्मा की अनुभूति होती है। जितना हमारा जीवन सहज-सरल, व पावन-पवित्र होता जाता है, उतना ही परमात्मा प्रसाद-स्वरूप हमारे जीवन में समाहित होता जाता है।

Thursday, March 21, 2019

तिब्बती योगा

आज की पीढ़ी अपनी पुरानी पीढ़ी की तुलना में अधिक जल्दी बूढ़ी हो रही है। इसके लिए जिम्मेदार है बाहर का वातावरण, उसकी अनियमित जीवन पद्धति और खानपान। आज की जीवनशैली और बढ़ते काम का दबाव भी इसके लिए जिम्मेदार है। इस तेजी से जीने की जीवनशैली को बदलकर अनुशासनबद्ध जीवनशैली में जीने का नाम ही है 'तिब्ब‍ती योगा।

उम्र को रोकने का एक कारगर उपाय है 'तिब्बती योगा'। इसमें कुछ खास बात है जो आपको जवान बनाए रखने में सक्षम है बशर्ते की आप इसका ईमानदारी से पालन करते हैं। 'तिब्ब‍ती योगा में अनुशासन का बहुत महत्व है। ‍यहां प्रस्तुत है तिब्बती योगा की मुख्य मुख्‍य बातें।

1.    श्वास पर नियंत्रण
2.    नियमित ध्यान
3.    अनुशासनबद्ध जीवन
4.    उचित आहार
5.    फलों का ज्यूस
6.    शुद्ध वातावरण
8.    पाचन क्रिया को सुचारू रूप से चलाने के लिए योगासन।
9.    इसके अलावा कुछ खास तरीके से किए जाने वाले अंग संचालन।

आपकी आयु आपके शरीर की उपचय और अपचय की क्रियाओं पर निर्भर है। यानी यदि आपके शरीर में अपचय की तुलना में उपचय की क्रियाएं बढ़ रही होती हैं तो इसका मतलब आप बुढ़ापे की ओर बढ़ रहे हैं। तिब्बती लामा योगाभ्यास इस हेतु ही करते हैं कि अंतःस्त्रावी ग्रंथियों के क्रम और चक्रों को उचित व्यवस्था में स्थित किया जा सके।

शरीर की चयापचयी क्रियाओं में संतुलन स्थापित कर शरीर के चक्र को सुधारकर शरीर को पूरी तरह दुरुस्त किया जा सकता है।

Sunday, March 17, 2019

मंगल प्रतीक

हिंदू धर्म में मंगल प्रतीकों का खासा महत्व है। इनके घर में होने से किसी भी कार्य में बाधा उत्पन्न नहीं होती। सभी कार्य मंगलमय तरीके से संपन्न होते हैं। जानते हैं कि वो मंगल प्रतीक कौन कौन से हैं

ॐ है सर्वोपरि मंगल प्रतीक : यह संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक है। बहुत-सी आकाश गंगाएँ इसी तरह फैली हुई है। ॐ शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है- अ, उ, म इन तीनों ध्वनियों का अर्थ उपनिषद में भी आता है। यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी है और यह भू: लोक, भूव: लोक और स्वर्ग लोग का प्रतीक है। ओम का घर में होना जरूरी है। यह मंगलकर्ता ओम ब्रह्म और गणेश का साक्षात् प्रतीक माना गया है।
स्वस्तिक : स्वस्तिक को शक्ति, सौभाग्य, समृद्धि और मंगल का प्रतीक माना जाता है। हर मंगल कार्य में इसको बनाया जाता है। स्वस्तिक का बायां हिस्सा गणेश की शक्ति का स्थान 'गं' बीजमंत्र होता है। इसमें, जो चार बिन्दियां होती हैं, उनमें गौरी, पृथ्वी, कच्छप और अनन्त देवताओं का वास होता है।

इस मंगल-प्रतीक का गणेश की उपासना, धन, वैभव और ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी के साथ, बहीखाते की पूजा की परम्परा आदि में विशेष स्थान है। इसकी चारों दिशाओं के अधिपति देवताओं, अग्नि, इन्द्र, वरुण एवं सोम की पूजा हेतु एवं सप्तऋषियों के आशीर्वाद को प्राप्त करने में प्रयोग किया जाता है।
मंगल कलश : सुख और समृद्धि के प्रतीक कलश का शाब्दिक अर्थ है- घड़ा। यह मंगल-कलश समुद्र मंथन का भी प्रतीक है। ईशान भूमि पर रोली, कुंकुम से अष्टदल कमल की आकृति बनाकर उस पर यह मंगल कलश रखा जाता है। एक कांस्य या ताम्र कलश में जल भरकल उसमें कुछ आम के पत्ते डालकर उसके मुख पर नारियल रखा होता है। कलश पर रोली, स्वास्तिक का चिन्ह बनाकर, उसके गले पर मौली (नाड़ा) बांधी जाती है।
शंख : शंख को नादब्रह्म और दिव्य मंत्री की संज्ञा दी गई है। शंख समुद्र मथंन के समय प्राप्त चौदह अनमोल रत्नों में से एक है। लक्ष्मी के साथ उत्पन्न होने के कारण इसे लक्ष्मी भ्राता भी कहा जाता है। यही कारण है कि जिस घर में शंख होता है वहां लक्ष्मी का वास होता है।

शंख सूर्य व चंद्र के समान देवस्वरूप है जिसके मध्य में वरुण, पृष्ठ में ब्रह्मा तथा अग्र में गंगा और सरस्वती नदियों का वास है। तीर्थाटन से जो लाभ मिलता है, वही लाभ शंख के दर्शन और पूजन से मिलता है।
रंगोली : रंगोली या मांडना हमारी प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति की समृद्धि के प्रतीक हैं, इसलिए 'चौंसठ कलाओं' में मांडना को भी स्थान प्राप्त है। इससे घर परिवार में मंगल रहता है। उत्सव-पर्व तथा अनेकानेक मांगलिक अवसरों पर रंगोली से घर-आंगन को खूबसूरती के साथ अलंकृत किया जाता है।
दीपक : सुन्दर और कल्याणकारी, आरोग्य और संपदा को देने वाले दीपक समृद्धि के साथ ही अग्नि और ज्योति का प्रतीक है। पारंपरिक दीपक मिट्टी का ही होता है। इसमें पांच तत्व हैं मिट्टी, आकाश, जल, अग्नि और वायु। हिंदू अनुष्ठान में पंचतत्वों की उपस्थिति अनिवार्य होती है।
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हाथी : विष्‍णु तथा लक्ष्‍मी को हाथी प्रिय रहा है। शक्‍ति, समृद्धि और सत्ता के प्रतीक हाथी को भगवाण गणेश का रूप माना जाता है। समुद्र मंथन में प्राप्‍त हुआ था ऐरावत हाथी, जो सफेद था। घर में ठोस चांदी या सोने का हाथ रखना चाहिए। इसके होने से घर में शांति रहती है।
मंगल सूत्र : हिंदू विवाहित नारी गले में मंगल सूत्र पहनती है। इसकी तुलना किसी अन्य आभूषण से नहीं की जाती। यह पति द्वारा पत्नी को विवाह के समय पहनाता है। यह मंगल सूत्र पति की कुशलता से जुड़ी मंगल कामना का प्रतीक है। इसका खोना या टूटना अपशकुन माना गया है।

जहां मंगल सूत्र का काला धागा और काला मोती स्त्री को बुरी नजर से बचाता है वहीं उसमें लगे सोने के पेंडिल से स्त्री में तेज और ऊर्जा का संचार बना रहता है।
गरुढ़ घंटी : जिन स्थानों पर घंटी बजने की आवाज नियमित आती है वहां का वातावरण हमेशा शुद्ध और पवित्र बना रहता है। इससे नकारात्मक शक्तियां हटती है। नकारात्मकता हटने से समृद्धि के द्वारा खुलते हैं।
-anirudh joshi

Friday, March 15, 2019

क्षमा : मानवीय जीवन की आधारशिला

क्षमा शब्द मानवीय जीवन की आधारशिला है। जिसके जीवन में क्षमा है, वही महानता को प्राप्त कर सकता है। क्षमावाणी हमें झुकने की प्रेरणा देती है। दसलक्षण पर्व हमें यही सीख ‍देता है कि क्षमावाणी के दिन हमें अपने जीवन से सभी तरह के बैर भाव-विरोध को मिटाकर प्रत्येक व्यक्ति से क्षमा मांगनी चाहिए। यही क्षमावाणी है।

सभी को झुकना सीखना चाहिए, क्योंकि क्षमा हमें झुकने की प्रेरणा देती है। चाहे छोटा हो या बड़ी क्षमा पर्व पर सभी से दिल से क्षमा मांगी जानी चाहिए।

क्षमा सिर्फ उससे नहीं मांगी जानी चाहिए, जो वास्त‍व में हमारा दुश्मन है। बल्कि हमें हर छोटे-बड़े जीवों से क्षमा मांगनी चाहिए। जब हमें क्रोध आता है तो हमारा चेहरा लाल हो जाता है और जब क्षमा मांगी जाती है तो चेहरे पर हंसी-मुस्कुराहट आ जाती है। क्षमा हमें अहंकार से दूर करके झुकने की कला सीखाती है। क्षमावाणी पर्व पर क्षमा को अपने जीवन में उतारना ही सच्ची मानवता है।

हम क्षमा उससे मांग‍ते हैं, जिसे हम धोखा देते है। जिसके प्रति मन में छल-कपट रखते है। जीवन का दीपक तो क्षमा मांग कर ही जलाया जा सकता है। अत: हमें अपनी प‍त्नी, बच्चों, बड़े-बुजुर्गों सभी से क्षमा मांगना चाहिए।

क्षमा मांगते समय मन में किसी तरह का संकोच, किसी तरह का खोट नहीं होना चाहिए। हमें अपनी आत्मा से क्षमा मांगनी चाहिए, क्योंकि मन के कषायों में फंसकर हम तरह-तरह के ढ़ोंग, स्वांग रचकर अपने द्वारा दूसरों को दुख पहुंचाते हैं। उन्हें गलत परिभाषित करने और नीचा दिखाने के चक्कर में हम दूसरों की भावनाओं का ध्यान नहीं रखते जो कि सरासर गलत है।

दसलक्षण पर्व के दिनों में किया गया त्याग और उपासना हमें जीवन की सच्ची राह दिखाते हैं। हमें तन, मन और वचन से चोरी, हिंसा, व्याभिचार, ईर्ष्या, क्रोध, मान, छल, गाली, निंदा और झूठ इन दस दोषों से दूर रहना ‍चाहिए।

दसलक्षण पर्व जैन धर्म के दस लक्षणों को दर्शाते हैं। जिनको अपने जीवन में उतार कर हम मनुष्य मुक्ति का मार्ग अपना सकता है।

दसलक्षण के दस धर्मों की शिक्षा

* उत्तम क्षमा - क्षमा को धारण करने वाला समस्त जीवों के प्रति मैत्रीभाव को दर्शाता है।

* उत्तम मार्दव - मनुष्य के मान और अहंकार का नाश करके उसकी विनयशीलता को दर्शाता है।

* उत्तम आर्जव - इस धर्म को अपनाने से मनुष्य निष्कपट एवं राग-द्वेष से दूर होकर सरल ह्रदय से जीवन व्यतीत करता है।

* उत्तम सत्य - जब जीवन में सत्य धर्म अवतरित हो जाता है, तब मनुष्य की संसार सागर से मुक्ति निश्चित है।

* उत्तम शौच - अपने मन को निर्लोभी बनाने की सीख देता है, उत्तम शौच धर्म। अपने जीवन में संतोष धारण करना ही इसका मुख्य उद्देश्य है।
* उत्तम संयम - अपने जीवन में संयम धारण करके ही मनुष्य का जीवन सार्थक हो सकता है।

* उत्तम तप - जो मनुष्य कठिन तप के द्वारा अपने तन-मन को शुद्ध करता है, उसके कई जन्मों के कर्म नष्ट हो जाते हैं।

* उत्तम त्याग - जीवन के त्याग धर्म को अपना कर चलने वाले मनुष्य को मुक्ति स्वयंमेव प्राप्त हो जाती है।

* उत्तम आंकिचन - जो मनुष्य जीवन के सभी प्रकार के परिग्रहों का त्याग करता है। उसे मोक्ष सुख की प्राप्ति अवश्य होती है।

* उत्तम ब्रह्मचर्य - जीवन में ब्रह्मचर्य धर्म के पालन करने से मोक्ष की प्राप्ति‍ अवश्य होती है।

इस प्रकार दस धर्मों को अपने जीवन में अपना कर जो व्यक्ति इसके अनुसार आचरण करता है, वह निश्चित ही निर्वाण पद को प्राप्त कर सकता है। पयुर्षण पर्व के यह दस दिन हमें इस तरह की शिक्षा ग्रहण करने की प्रेरणा देते है और निरंतर क्षमा के पथ पर आगे बढ़ाते हुए मोक्ष की प्राप्ति कराते हैं।

अत: क्षमावाणी के दिन बिना किसी संकोच के तन-मन से सभी से क्षमायाचना मांगना (करना) ही जैन धर्म का उद्देश्य है।

क्षमावाणी पर्व पर मैं दिल से सभी से क्षमायाचना करता / करती हूं।

Wednesday, March 13, 2019

पुण्यों का मोल

एक व्यापारी जितना अमीर था उतना ही दान-पुण्य करने वाला, वह सदैव यज्ञ-पूजा आदि कराता रहता था।
एक यज्ञ में उसने अपना सब-कुछ दान कर दिया। अब उसके पास परिवार चलाने लायक भी पैसे नहीं बचे थे।
व्यापारी की पत्नी ने सुझाव दिया कि पड़ोस के नगर में एक बड़े सेठ रहते हैं। वह दूसरों के पुण्य खरीदते हैं।
आप उनके पास जाइए और अपने कुछ पुण्य बेचकर थोड़े पैसे ले आइए, जिससे फिर से काम-धंधा शुरू हो सके।
पुण्य बेचने की व्यापारी की बिलकुल इच्छा नहीं थी, लेकिन पत्नी के दबाव और बच्चों की चिंता में वह पुण्य बेचने को तैयार हुआ। पत्नी ने रास्ते में खाने के लिए चार रोटियां बनाकर दे दीं।
व्यापारी चलता-चलता उस नगर के पास पहुंचा जहां पुण्य के खरीदार सेठ रहते थे। उसे भूख लगी थी।
नगर में प्रवेश करने से पहले उसने सोचा भोजन कर लिया जाए। उसने जैसे ही रोटियां निकालीं एक कुतिया तुरंत के जन्मे अपने तीन बच्चों के साथ आ खड़ी हुई।
कुतिया ने बच्चे जंगल में जन्म दिए थे। बारिश के दिन थे और बच्चे छोटे थे, इसलिए वह उन्हें छोड़कर नगर में नहीं जा सकती थी। 
व्यापारी को दया आ गई। उसने एक रोटी कुतिया को खाने के लिए दे दिया।
कुतिया पलक झपकते रोटी चट कर गई लेकिन वह अब भी भूख से हांफ रही थी।
व्यापारी ने दूसरी रोटी, फिर तीसरी और फिर चारो रोटियां कुतिया को खिला दीं। खुद केवल पानी पीकर सेठ के पास पहुंचा।
व्यापारी ने सेठ से कहा कि वह अपना पुण्य बेचने आया है। सेठ व्यस्त था। उसने कहा कि शाम को आओ।
दोपहर में सेठ भोजन के लिए घर गया और उसने अपनी पत्नी को बताया कि एक व्यापारी अपने पुण्य बेचने आया है। उसका कौन-सा पुण्य खरीदूं।
सेठ की पत्नी बहुत पतिव्रता और सिद्ध थी। उसने ध्यान लगाकर देख लिया कि आज व्यापारी ने कुतिया को रोटी खिलाई है।
उसने अपने पति से कहा कि उसका आज का पुण्य खरीदना जो उसने एक जानवर को रोटी खिलाकर कमाया है। वह उसका अब तक का सर्वश्रेष्ठ पुण्य है।
व्यापारी शाम को फिर अपना पुण्य बेचने आया। सेठ ने कहा- आज आपने जो यज्ञ किया है मैं उसका पुण्य लेना चाहता हूं।
व्यापारी हंसने लगा। उसने कहा कि अगर मेरे पास यज्ञ के लिए पैसे होते तो क्या मैं आपके पास पुण्य बेचने आता!
सेठ ने कहा कि आज आपने किसी भूखे जानवर को भोजन कराकर उसके और उसके बच्चों के प्राणों की रक्षा की है। मुझे वही पुण्य चाहिए।
व्यापारी वह पुण्य बेचने को तैयार हुआ। सेठ ने कहा कि उस पुण्य के बदले वह व्यापारी को चार रोटियों के वजन के बराबर हीरे-मोती देगा।
चार रोटियां बनाई गईं और उसे तराजू के एक पलड़े में रखा गया। दूसरे पलड़े में सेठ ने एक पोटली में भरकर हीरे-जवाहरात रखे। पलड़ा हिला तक नहीं। दूसरी पोटली मंगाई गई.. फिर भी पलड़ा नहीं हिला।
कई पोटलियों के रखने पर भी जब पलड़ा नहीं हिला तो व्यापारी ने कहा- सेठजी, मैंने विचार बदल दिया है. मैं अब पुण्य नहीं बेचना चाहता।
व्यापारी खाली हाथ अपने घर की ओर चल पड़ा। उसे डर हुआ कि कहीं घर में घुसते ही पत्नी के साथ कलह न शुरू हो जाए।
जहां उसने कुतिया को रोटियां डाली थी, वहां से कुछ कंकड़-पत्थर उठाए और साथ में रखकर गांठ बांध दी।
घर पहुंचने पर पत्नी ने पूछा कि पुण्य बेचकर कितने पैसे मिले तो उसने थैली दिखाई और कहा इसे भोजन के बाद रात को ही खोलेंगे। इसके बाद गांव में कुछ उधार मांगने चला गया।
इधर उसकी पत्नी ने जबसे थैली देखी थी उसे सब्र नहीं हो रहा था। पति के जाते ही उसने थैली खोली। उसकी आंखे फटी रह गईं। थैली हीरे जवा-हरातों से भरी थी।
व्यापारी घर लौटा तो उसकी पत्नी ने पूछा कि पुण्यों का इतना अच्छा मोल किसने दिया ? इतने हीरे-जवाहरात कहां से आए..??
व्यापारी को अंदेशा हुआ कि पत्नी सारा भेद जानकर ताने तो नहीं मार रही लेकिन, उसके चेहरे की चमक से ऐसा लग नहीं रहा था।
व्यापारी ने कहा- दिखाओ कहां हैं हीरे-जवाहरात। पत्नी ने लाकर पोटली उसके सामने उलट दी। उसमें से बेशकीमती रत्न गिरे। व्यापारी हैरान रह गया।
फिर उसने पत्नी को सारी बात बता दी। पत्नी को पछतावा हुआ कि उसने अपने पति को विपत्ति में पुण्य बेचने को विवश किया।
दोनों ने तय किया कि वह इसमें से कुछ अंश निकालकर व्यापार शुरू करेंगे। व्यापार से प्राप्त धन को इसमें मिलाकर जनकल्याण में लगा देंगे।
ईश्वर आपकी परीक्षा लेता है। परीक्षा में वह सबसे ज्यादा आपके उसी गुण को परखता है जिस पर आपको गर्व हो।
अगर आप परीक्षा में खरे उतर जाते हैं तो ईश्वर वह गुण आपमें हमेशा के लिए वरदान स्वरूप दे देते हैं।
अगर परीक्षा में उतीर्ण न हुए तो ईश्वर उस गुण के लिए योग्य किसी अन्य व्यक्ति की तलाश में लग जाते हैं।
इसलिए विपत्तिकाल में भी भगवान पर भरोसा रखकर सही राह चलनी चाहिए। आपके कंकड़-पत्थर भी अनमोल रत्न हो सकते हैं।
*न डर रे मन दुनिया से, यहाँ किसी के चाहने से नहीं.. किसी का बुरा होता है, मिलता है वही.. जो हमने बोया होता है, कर पुकार उस प्रभु के आगे.. क्योकि सब कुछ उसी के बस में होता है।।*

Monday, February 11, 2019

मन मन्दिर को निर्मल बनाओ

प्यारे प्रभु के दर्शन करने हैं तो मन मन्दिर की सफाई करो। तब देव अपनी सर्व शक्तियों से उसमें पधारेंगे। मन को निर्मल बनाने के लिए अपने में मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा आदि भावनाओं को जगाओ। अर्थात् सुखी पुरुषों में मित्रता, दुखियों पर करुणा-पुण्य आत्माओं पर हर्ष और पापियों पर उपेक्षा की भावना से चित्त निर्मल हो जाता है। मैत्री, करुणा और हर्ष से चित में उत्साह और शान्ति रहती है और पापियों की उपेक्षा करने से मनुष्य क्रोध से बच जाता है। इसके अलावा छल, कपट और स्वार्थादि दोषों को छोड़ दो, दोनों में स्वार्थ मुख्य है।

इसके उदय होने से शेष सब अवगुण अपना बल बढ़ाते हैं। गुणों में मैत्री सबसे अधिक मूल्यवान है। इसके आने पर शेष सब गुण इसकी छाया मैं आ जाते हैं प्रेम प्रकाश है, स्वार्थ अन्धकार है, प्रेम उदार है स्वार्थ धोखे का बाजार है। प्रेम ने संसार को सुधारा स्वार्थ ने संसार को बिगाड़ा- प्रेम परमेश्वर से मिलाता है। स्वार्थ संसार के बंधन में गिराता है।

इसलिए प्रेम सत्संग, स्वाध्याय द्वारा निष्कपट, सरल स्वभाव से अपने अन्तःकरण को पवित्र बनाओ अनेक जन्मों की परम्परा से जो बुरी वासनायें दृढ़ हो गई हैं उनको दूर करो, स्वार्थ को छोड़कर सच्ची प्रभु भक्ति साधारणतया, प्राणी मात्र की सेवा और विशेषतया मनुष्य मात्र की सेवा करो। इस प्रकार जो मल बुरे खोटे कर्मों के करने से बढ़ता है, विक्षेप जो पुरुषार्थ न करके केवल इच्छा करते रहने से मन को चंचल बनाता है और आवरण जो स्वाध्याय सत्संग के बिना बढ़ता है को दूर करके भगवान की कृपा को प्राप्त करो। यही एक सरल मार्ग है।

✍🏻 स्वामी सर्वदानन्द जी महाराज
📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1943

Sunday, February 3, 2019

देवताओं के गायत्री मन्त्र

🔷 अनेक कष्टो से मनुष्य की रक्षा करता है गायत्री मंत्र।
भूत प्रेत, चोर डाकू, राज कोप, आशंका, भय, अकाल मृत्यु, रोग और अनेक प्रकार की बाधाओं का निवारण करके मनुष्य को सदैव तेजश्वी बनाय रखता है।
इन मंत्रों को प्रतिदिन जपकर सुख, सौभाग्य, समृद्धि और ऎश्वर्य प्राप्ति की जा शक्ति है।

🔶 १. गणेश गायत्री:- यह समस्त प्रकार के विघ्नों का निवारण करने में सक्षम है
ॐ एक दृष्टाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो बुद्धिः प्रचोदयात्।

🔷 २. नृसिंह गायत्री:- यह मंत्र पुरषार्थ एवं पराक्रम की बृद्धि होती है।
ॐ उग्रनृसिंहाय विद्महे वज्रनखाय धीमहि। तन्नो नृसिंह: प्रचोदयात्।

🔶 ३. विष्णु गायत्री:- यह पारिवारिक कलह को समाप्त करता है।
ॐ नारायण विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णु: प्रचोदयात्।

🔷 ४. शिव गायत्री:- यह कल्याण करने में अदूतीय है।
ॐ पंचवक्त्राय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्र: प्रचोदयात्।

🔶 ५. कृष्ण गायत्री:- यह मंत्र कर्म क्षेत्र की सफलता हेतु इसका जप आवश्यक है।
ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो कृष्ण: प्रचोदयात्।

🔷 ६. राधा गायत्री:- यह मंत्र प्रेम का अभाव दूर होकर, पूर्णता को पहुचता है।
ॐ वृषभानुजायै विद्महे कृष्णप्रियायै धीमहि। तन्नो राधा प्रचोदयात्।

🔶 ७. लक्ष्मी गायत्री:- यह मंत्र पद प्रतिष्ठा, यश ऐश्वर्य और धन Sसम्पति की प्राप्ति होती है।
ॐ महालक्ष्म्यै विद्महे विष्णुप्रियायै धीमहि । तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्।

🔷 ८. अग्नि गायत्री:- यह मंत्र इंद्रियों की तेजस्विता बढ़ती है।
ॐ महाज्वालाय विद्महे अग्निदेवाय धीमहि। तन्नो अग्नि: प्रचोदयात्।

🔶 ९. इन्द्र गायत्री:- यह मंत्र दुश्मनों है हमले से बचाता है।
ॐ सहस्त्रनेत्राय विद्महे वज्रहस्ताय धीमहि। तन्नो इन्द्र: प्रचोदयात्।

🔷 १०. सरस्वती गायत्री:- यह मंत्र ज्ञान बुद्धि की वृद्धि होती है एवं स्मरण शक्ति बढ़ती है।
ॐ सरस्वत्यै विद्महे ब्रह्मपुत्र्यै धीमहि। तन्नो देवी प्रचोदयात्।

🔶 ११. दुर्गा गायत्री:- यह मंत्र से दुखः और पीड़ानही रहती है।शत्रु नाश, विघ्नों पर विजय मिलती है।
ॐ गिरिजायै विद्महे शिवप्रियायै धीमहि। तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्।

🔷 १२. हनुमान गायत्री:- यह मंत्र कर्म के प्रति निष्ठा की भावना जागृत होती हैं।
ॐ अंजनी सुताय विद्महे वायुपुत्राय धीमहि।  तन्नो मारुति: प्रचोदयात्।

🔶 १३. पृथ्वी गायत्री:- यह मंत्र दृढ़ता, धैर्य और सहिष्णुता की वृद्धि होती है।
ॐ पृथ्वीदेव्यै विद्महे सहस्त्रमूत्यै धीमहि। तन्नो पृथ्वी प्रचोदयात्।

🔷 १४. सूर्य गायत्री:- यह मंत्र शरीर के सभी रोगों से मुक्ति मिल जाती है।
ॐ भास्कराय विद्महे दिवाकराय धीमहि। तन्नो सूर्य: प्रचोदयात्।

🔶 १५. राम गायत्री:- यह मंत्र इससे मान प्रतिष्ठा बढती है।
ॐ दशरथाय विद्महे सीतावल्लभाय धीमहि। तन्नो राम: प्रचोदयात्।

🔷 १६. सीता गायत्री:- यह मंत्र तप की शक्ति में वृद्धि होती है।
ॐ जनकनन्दिन्यै विद्महे भूमिजायै धीमहि। तन्नो सीता प्रचोदयात्।

🔶 १७. चन्द्र गायत्री:- यह मंत्र निराशा से मुक्ति मिलती है और मानसिकता प्रवल होती है।
ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृतत्त्वाय धीमहि। तन्नो चन्द्र: प्रचोदयात्।

🔷 १८. यम गायत्री:- यह मंत्र इससे मृत्यु भय से मुक्ति मिलती है।
ॐ सूर्यपुत्राय विद्महे महाकालाय धीमहि। तन्नो यम: प्रचोदयात्।

🔶 १९. ब्रह्मा गायत्री:- यह मंत्र व्यापारिक संकटो को दूर करता है।
ॐ चतुर्मुखाय विद्महे हंसारुढ़ाय धीमहि। तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात्।

🔷 २०. वरुण गायत्री:- यह मंत्र प्रेम भावना जागृत होती है, भावनाओ का उदय होता हैं।
ॐ जलबिम्वाय विद्महे नीलपुरुषाय धीमहि। तन्नो वरुण: प्रचोदयात्।

🔶 २१. नारायण गायत्री:- यह मंत्र प्रशासनिक प्रभाव बढ़ता है।
ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो नारायण: प्रचोदयात्।

🔷 २२. हयग्रीव गायत्री:- यह मंत्र समस्त भयो का नाश होता है।
ॐ वागीश्वराय विद्महे हयग्रीवाय धीमहि। तन्नो हयग्रीव: प्रचोदयात्।

🔶 २३. हंस गायत्री:- यह मंत्र विवेक शक्ति का विकाश होता है,बुद्धि प्रखर होती है।
ॐ परमहंसाय विद्महे महाहंसाय धीमहि। तन्नो हंस: प्रचोदयात्।

🔷 २४. तुलसी गायत्री:- परमार्थ भावना की उत्त्पति होती है।
ॐ श्रीतुलस्यै विद्महे विष्णुप्रियायै धीमहि। तन्नो वृन्दा प्रचोदयात्।

🔶 गायत्री साधना का प्रभाव तत्काल होता है जिससे साधक को आत्मबल प्राप्त होता है और मानसिक कष्ट में तुरन्त शान्ति मिलती है। इस महामन्त्र के प्रभाव से आत्मा में सतोगुण बढ़ता है।

🔷 गायत्री की महिमा के सम्बन्ध में क्या कहा जाए। ब्रह्म की जितनी महिमा है, वह सब गायत्री की भी मानी जाती हैं। वेदमाता गायत्री से यही विनम्र प्रार्थना है कि वे दुर्बुद्धि को मिटाकर सबको सद्बुद्धि प्रदान करें।