Sunday, February 28, 2021

गायत्री मंत्र के शुद्ध उच्चारण में हैं कई असाध्य रोगों का समाधान!

आधुनिक समाज में तनावपूर्ण जीवन के चलते मानव उच्च रक्तचाप, हृदयरोग और कैंसर आदि जानलेवा बीमारियों की चपेट में आ रहा है। जीवनशैली में सुधार से बहुत से रोग यूं ही काफूर हो जाते हैं। साथ-साथ एक और आसान उपाय है, जिसमें कोई पैसा नहीं लगता और जिसके कोई साइड इफेक्ट नहीं होते। बस नियमपूर्वक नित्य करने की जरूरत भर है। यह आसान उपाय है गायत्री मंत्र, जो सदियों से आजमाया हुआ है। और आजकल इसे विज्ञान की कसौटी पर भी कसा जा चुका है।


जबलपुर चिकित्सा महाविद्यालय में कार्डियोलाजी विभाग के रीडर हैं डा.रविशंकर शर्मा, इन्होंने अपने 18 वर्ष के चिकीत्सकीय जीवन में देखा कि जो युवा हृदयरोगी उनके पास इलाज के लिए आए उनके साथ आने वाले सहयोगी 60-70 की उम्र के बावजूद काफी स्वस्थ थे। बातचीत से पता चला कि वे निरामिष भोजन के अलावा गायत्री मंत्र का नियमित पाठ करते हैं। इस सूत्र को लेकर डा.शर्मा ने 20 परिवारों का अध्ययन किया। हर परिवार से दो व्यक्ति लिए एक वह जो नियमित गायत्री मंत्र का पाठ करता था और दूसरा वह जो पाठ नहीं करता था। डा.शर्मा ने पाया कि नियमित पाठ करने वाले को उच्च रक्तचाप और हृदयरोग अध्ययन के प्रारंभ में भी नहीं के बराबर थे। तीन वर्ष के अंतराल के बाद भी ये रोग उत्पन्न नहीं हुए। मंत्र न पढ़ने वालों में ये रोग ज्यादा संख्या में हुए। मृत्युदर भी मंत्र न पढ़ने वालों में ज्यादा मिली।


अध्ययन के नतीजों से उत्साहित होकर डा.शर्मा ने उच्च रक्तचाप के 50 रोगियों में से आधे मरीजों को हर दो घंटे में पांच मिनट यह मंत्र पाठ करने की विधि सिखाई। बचे हुए आधे मरीजों को एक दवा रहित गोली(प्लेसिबो) खाने को दी गई। एक हफ्ते बाद इन समूहों को परखा गया तो पता चला कि जो व्यक्ति मंत्र पढ़ रहे थे वे उच्च रक्तचाप के कम होने से लाभांवित हुए और प्लेसिबो टेबलेट खाने वालों को लाभ नहीं हुआ। हृदय गति की अनियमितता और तेज हृदयगति के रोगियों को भी इस मंत्र से लाभ हुआ। अगर ओम शब्द को लंबे समय तक ओ और म को खींचकर पढ़ा जाए तो हृदय गति तुरंत कम हो जाती है। इसीजी से मानिटर करने पर भी इसकी पुष्टि हुई। कोई भी ऐसी सुरक्षित दवा नहीं है जो हृदय गति को इतनी जल्दी तथा सुरक्षित तरीके से कम कर दे।


1.   यह मंत्र किसी भी अवस्था में अर्थात बैठ कर लेट कर या खड़े होकर पढ़ा जाए तो समान लाभ मिलता है।


2.    मंत्र ओम शब्द से शुरू होता है- ओम शब्द को जितना लंबा खींचा जा सके, बिना सांस लिए उतना खींचिये। ओ और म शब्द को अलग-अलग लंबा खींचिए।


3.    इसके बाद शेष मंत्र को सही उच्चारण के साथ जितना तेज गति से पढ़ या बोल सकें बोलें। ओम की प्रक्रिया हर बार दोहराएं। पांच मिनट तक लगातार ओम और मंत्र दोहराते रहें।


4.    यह प्रक्रिया एक माह तक हर दो घंटे में करें। इस प्रकार सामान्य व्यक्ति के जाग्रत 16 घंटे में 8 बार करें। 24 घंटों में कुल 40 मिनट का समय देना हैं।


5.    एक माह बाद इस प्रक्रिया का लाभदायक असर अवश्य दिखाई देगा। अब इस प्रक्रिया को 24 घंटे में चार बार करते हुए जारी रखें।


6.    सुबह उठने के समय और रात सोने के समय इस मंत्र का पांच-पांच मिनट उच्चारण आवश्यक है। इसके बाद सिर्फ दो बार कोई निश्चित समय तय कर इस मंत्र का नियमित पाठ करते रहें।


7.    इस विधि के साथ अपने डाक्टर द्वारा सुझाई दवाएं जारी रख सकते हैं।


8.     इस विधि से कोई हानि नहीं होती और न कोई साइड इफेक्टस होते हैं।

गायत्री मंत्र

 हिंदू धर्म में मां गायत्री को वेदमाता कहा जाता है अर्थात सभी वेदों की उत्पत्ति इन्हीं से हुई है। गायत्री को भारतीय संस्कृति की जननी भी कहा जाता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को मां गायत्री का अवतरण माना जाता है। इस दिन को हम गायत्री जयंती के रूप में मनाते है। मां गायत्री को हमारे वेद शास्त्रों में वेदमाता कहा गया है।


धर्म ग्रंथों में यह भी लिखा है कि गायत्री उपासना करने वाले की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं तथा उसे कभी किसी वस्तु की कमी नहीं होती। गायत्री से आयु, प्राण, प्रजा, पशु, कीर्ति, धन एवं ब्रह्मवर्चस के सात प्रतिफल अथर्ववेद में बताए गए हैं, जो विधिपूर्वक उपासना करने वाले हर साधक को निश्चित ही प्राप्त होते हैं। विधिपूर्वक की गयी उपासना साधक के चारों ओर एक रक्षा कवच का निर्माण करती है व विपत्तियों के समय उसकी रक्षा करती है।


मां गायत्री को पंचमुखी माना गया है


हिंदू धर्म में मां गायत्री को पंचमुखी माना गया है जिसका अर्थ है यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड जल, वायु, पृथ्वी, तेज और आकाश के पांच तत्वों से बना है। संसार में जितने भी प्राणी हैं, उनका शरीर भी इन्हीं पांच तत्वों से बना है। इस पृथ्वी पर प्रत्येक जीव के भीतर गायत्री प्राण-शक्ति के रूप में विद्यमान है। यही कारण है गायत्री को सभी शक्तियों का आधार माना गया है इसीलिए भारतीय संस्कृति में आस्था रखने वाले हर प्राणी को प्रतिदिन गायत्री उपासना अवश्य करनी चाहिए।


विद्या और तप


गायत्री साधक के रूप में सामान्य जन को अमृत, पारस, कल्पवृक्ष रूपी लाभ सुनिश्चित रूप से आज भी मिल सकते है, पर उसके लिए पहले ब्राह्मण बनना होगा। गुरुवर के शब्दों में ' ब्राह्मण की पूँजी है- विद्या और तप। अपरिग्रही ही वास्तव में सच्चा ब्राह्मण बनकर गायत्री की समस्त सिद्धियों का स्वामी बन सकता है, जिसे ब्रह्मवर्चस के रूप में प्रतिपादित किया गया है।'


गायत्री उपासना से लाभ


युगऋषि ने लिखा है कि परब्रह्म निराकार, अव्यक्त है। अपनी जिस अलौकिक शक्ति से वह स्वयं को विराट रूप में व्यक्त करता है, वह गायत्री है। इसी शक्ति के सहारे जीव मायाग्रस्त होकर विचरण करता है और इसी के सहारे माया से मुक्त होकर पुनः परमात्मा तक पहुँचता है।


सरल और फलदायी मंत्र


गायत्री मंत्र को जगत की आत्मा माने गए साक्षात देवता सूर्य की उपासना के लिए सबसे सरल और फलदायी मंत्र माना गया है. यह मंत्र निरोगी जीवन के साथ-साथ यश, प्रसिद्धि, धन व ऐश्वर्य देने वाली होती है। लेकिन इस मंत्र के साथ कई युक्तियां भी जुड़ी है. अगर आपको गायत्री मंत्र का अधिक लाभ चाहिए तो इसके लिए गायत्री मंत्र की साधना विधि विधान और मन, वचन, कर्म की पवित्रता के साथ जरूरी माना गया है।


सुख, सफलता व शांति की चाहत


वेदमाता मां गायत्री की उपासना 24 देवशक्तियों की भक्ति का फल व कृपा देने वाली भी मानी गई है। इससे सांसारिक जीवन में सुख, सफलता व शांति की चाहत पूरी होती है। खासतौर पर हर सुबह सूर्योदय या ब्रह्ममुहूर्त में गायत्री मंत्र का जप ऐसी ही कामनाओं को पूरा करने में बहुत शुभ व असरदार माना गया है।


मंत्र: ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।


अर्थात् 'सृष्टिकर्ता प्रकाशमान परमात्मा के प्रसिद्ध वरण करने योग्य तेज़ का (हम) ध्यान करते हैं, वे परमात्मा हमारी बुद्धि को (सत् की ओर) प्रेरित करें।


गायत्री मंत्र जप से जुड़ी खास बातें

गायत्री मंत्र जप किसी गुरु के मार्गदर्शन में करना चाहिए।

गायत्री मंत्र जप के लिए सुबह का समय श्रेष्ठ होता है। किंतु यह शाम को भी किए जा सकते हैं।

गायत्री मंत्र के लिए स्नान के साथ मन और आचरण पवित्र रखें। किंतु सेहत ठीक न होने या अन्य किसी वजह से स्नान करना संभव न हो तो किसी गीले वस्त्रों से तन पोंछ लें।

साफ और सूती वस्त्र पहनें।

कुश या चटाई का आसन बिछाएं। पशु की खाल का आसन निषेध है।

तुलसी या चन्दन की माला का उपयोग करें।

ब्रह्ममूहुर्त में यानी सुबह होने के लगभग 2 घंटे पहले पूर्व दिशा की ओर मुख करके गायत्री मंत्र जप करें। शाम के समय सूर्यास्त के घंटे भर के अंदर जप पूरे करें। शाम को पश्चिम दिशा में मुख रखें।


इस मंत्र का मानसिक जप किसी भी समय किया जा सकता है।

शौच या किसी आकस्मिक काम के कारण जप में बाधा आने पर हाथ-पैर धोकर फिर से जप करें। बाकी मंत्र जप की संख्या को थोड़ी-थोड़ी पूरी करें। साथ ही अधिक माला कर जप बाधा दोष का शमन करें।

गायत्री मंत्र जप करने वाले का खान-पान शुद्ध और पवित्र होना चाहिए। किंतु जिन लोगों का सात्विक खान-पान नहीं है, वह भी गायत्री मंत्र जप कर सकते हैं। क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस मंत्र के असर से ऐसा व्यक्ति भी शुद्ध और सद्गुणी बन जाता है।


कैसे करें गायत्री उपासना...?


गायत्री की उपासना तीनों कालों में की जाती है, प्रात: मध्याह्न और सायं। तीनों कालों के लिये इनका पृथक्-पृथक् ध्यान है। प्रात:काल ये सूर्यमण्डल के मध्य में विराजमान रहती है। उस समय इनके शरीर का रंग लाल रहता है। ये अपने दो हाथों में क्रमश: अक्षसूत्र और कमण्डलु धारण करती हैं। इनका वाहन हंस है तथा इनकी कुमारी अवस्था है। इनका यही स्वरूप ब्रह्मशक्ति गायत्री के नाम से प्रसिद्ध है। इसका वर्णन ऋग्वेद में प्राप्त होता है।


मध्याह्न काल में इनका युवा स्वरूप है। इनकी चार भुजाएँ और तीन नेत्र हैं। इनके चारों हाथों में क्रमश: शंख, चक्र, गदा और पद्म शोभा पाते हैं। इनका वाहन गरूड है। गायत्री का यह स्वरूप वैष्णवी शक्ति का परिचायक है। इस स्वरूप को सावित्री भी कहते हैं। इसका वर्णन यजुर्वेद में मिलता है। 


सायं काल में गायत्री की अवस्था वृद्धा मानी गयी है। इनका वाहन वृषभ है तथा शरीर का वर्ण शुक्ल है। ये अपने चारों हाथों में क्रमश: त्रिशूल, डमरू, पाश और पात्र धारण करती हैं। यह रुद्र शक्ति की परिचायिका हैं इसका वर्णन सामवेद में प्राप्त होता है।


गायत्री मंत्र में 24 अक्षर

हम नित्य गायत्री मंत्र का जाप करते हैं। लेकिन उसका पूरा अर्थ नहीं जानते। गायत्री मंत्र की महिमा अपार हैं। गायत्री, संहिता के अनुसार, गायत्री मंत्र में कुल 24 अक्षर हैं। ये चौबीस अक्षर इस प्रकार हैं- 1। तत् 2.स 3। वि 4। तु 5। र्व 6। रे 7। णि 8। यं 9। भ 10। गौं 11। दे 12। व 13। स्य 14। धी 15। म 16। हि 17। धि 18। यो 19। यो 20। न: 21। प्र 22। चो 23। द 24। यात् वृहदारण्यक के अनुसार हम उक्त शब्दावली का भाव इस प्रकार समझते हैं।


तत्सवितुर्वरेण्यं: अर्थात् मधुर वायु चलें, नदी और समुद्र रसमय होकर रहें। औषधियां हमारे लिए मंगलमय हों। भूलोक हमें सुख प्रदान करें।


भर्गो देवस्य धीमहि:अर्थात् रात्रि और दिन हमारे लिए सुखकारण हों। पृथ्वी की रज हमारे लिए मंगलमय हो।


धियो यो न: प्रचोदयात्: अर्थात् वनस्पतियां हमारे लिए रसमयी हों। सूर्य हमारे लिए सुखप्रद हो, उसकी रश्मियां हमारे लिए कल्याणकारी हों। सब हमारे लिए सुखप्रद हों। मैं सबके लिए मधुर बन जाऊं।


गायत्री मंत्र के जप से यह लाभ प्राप्त होते हैं-

उत्साह एवं सकारात्मकता बढ़ती है,

त्वचा में चमक आती है, 

तामसिकता से घृणा होती है, 

परमार्थ में रूचि जागती है, 

आने वाली घटनाओं का पूर्वाभास होने लगता है, 

आर्शीवाद देने की शक्ति बढ़ती है, 

नेत्रों में तेज आता है, 

स्वप्न सिद्धि प्राप्त होती है, 

क्रोध शांत होता है, 

ज्ञान की वृद्धि होती है।


विद्यार्थीयों के लिए----


गायत्री मंत्र का जप सभी के लिए उपयोगी है किंतु विद्यार्थियों के लिए तो यह मंत्र बहुत लाभदायक है। रोजाना इस मंत्र का एक सौ आठ बार जप करने से विद्यार्थी को सभी प्रकार की विद्या प्राप्त करने में आसानी होती है। विद्यार्थियों को पढऩे में मन नहीं लगना, याद किया हुआ भूल जाना, शीघ्रता से याद न होना आदि समस्याओं से निजात मिल जाती है।


दरिद्रता के नाश के लिए


यदि किसी व्यक्ति के व्यापार, नौकरी में हानि हो रही है या कार्य में सफलता नहीं मिलती, आमदनी कम है तथा व्यय अधिक है तो उन्हें गायत्री मंत्र का जप काफी फायदा पहुंचाता है। शुक्रवार को पीले वस्त्र पहनकर हाथी पर विराजमान गायत्री माता का ध्यान कर गायत्री मंत्र के आगे और पीछे श्रीं सम्पुट लगाकर जप करने से दरिद्र का नाश होता है। इसके साथ ही रविवार को व्रत किया जाए तो ज्यादा लाभ होता है।


संतान संबंधी परेशानियां दूर करने के लिए


किसी दंपत्ति को संतान प्राप्त करने में कठिनाई आ रही हो या संतान से दुखी हो अथवा संतान रोगग्रस्त हो तो प्रात: पति-पत्नी एक साथ सफेद वस्त्र धारण कर यौं बीज मंत्र का सम्पुट लगाकर गायत्री मंत्र का जप करें। संतान संबंधी किसी भी समस्या से शीघ्र मुक्ति मिलती है।


शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिए


यदि कोई व्यक्ति शत्रुओं के कारण परेशानियां झेल रहा हो तो उसे प्रतिदिन या विशेषकर मंगलवार, अमावस्या अथवा रविवार को लाल वस्त्र पहनकर माता दुर्गा का ध्यान करते हुए गायत्री मंत्र के आगे एवं पीछे क्लीं बीज मंत्र का तीन बार सम्पुट लगाकार एक सौ आठ बार जाप करने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। मित्रों में सद्भाव, परिवार में एकता होती है तथा न्यायालयों आदि कार्यों में भी विजय प्राप्त होती है।


विवाह कार्य में देरी हो रही हो तो


यदि किसी भी जातक के विवाह में अनावश्यक देरी हो रही हो तो सोमवार को सुबह के समय पीले वस्त्र धारण कर माता पार्वती का ध्यान करते हुए ह्रीं बीज मंत्र का सम्पुट लगाकर एक सौ आठ बार जाप करने से विवाह कार्य में आने वाली समस्त बाधाएं दूर होती हैं। यह साधना स्त्री पुरुष दोनों कर सकते हैं।


यदि किसी रोग के कारण परेशानियां हो तो


यदि किसी रोग से परेशान है और रोग से मुक्ति जल्दी चाहते हैं तो किसी भी शुभ मुहूर्त में एक कांसे के पात्र में स्वच्छ जल भरकर रख लें एवं उसके सामने लाल आसन पर बैठकर गायत्री मंत्र के साथ ऐं ह्रीं क्लीं का संपुट लगाकर गायत्री मंत्र का जप करें। जप के पश्चात जल से भरे पात्र का सेवन करने से गंभीर से गंभीर रोग का नाश होता है। यही जल किसी अन्य रोगी को पीने देने से उसके भी रोग का नाश होता हैं।

Friday, February 5, 2021

दुःख के सुअवसर



दुःख की कल्पना मात्र से कंपकपी होने लगती है। इसके अहसास से मन विकल, विह्वल, बेचैन हो जाता है। ऐसे में दुःख से होने वाले दर्द की कौन कहे? यही वजह है कि दुःख से सभी भागना चाहते हैं। और अपने जीवन से दुःख को भगाना चाहते हैं। दुःख से भागने और दुःख को भगाने की बात आम है। जो सामान्य जनों और सर्वसाधारण के लिए है। लेकिन इसकी एक खास बात भी है। जो सत्यान्वेषियों के लिए, साधकों के लिए और भगवद्भक्तों के लिए है। यह अनुभूति विरले लोग पाते हैं। ऐसे लोग दुःख से भागते नहीं, बल्कि दुःख में जागते हैं।



दुःख उनके लिए रोने, कलपने का साधन नहीं बल्कि परमात्मा द्वारा प्रेरित और उन्हीं के द्वारा प्रदत्त जागरण का अवसर बनता है। दुःख के क्षणों में उनकी अन्तर्चेतना में संकल्प, साहस, संवेदना, पुरुषार्थ की प्रखरता और प्रज्ञा की पवित्रता जागती है। उनकी आत्मचेतना में अनुभूतियों के नए गवाक्ष खुलते हैं, उपलब्धियों के नए अवसर आते हैं। इसीलिए तपस्वियों ने दुःख को देवों के हाथ का हथौड़ा कहा है। जो चेतना में उन्नयन के नए सोपान सृष्ट करता है। विकास और परिष्कार के नए द्वार खोलता है।



तभी तो सन्तों ने, साधुओं, दरवेशों और फकीरों ने भगवान् से हमेशा दुःख के वरदान मांगे हैं। सुख की चाहत तो बस आलसी, विलासी करते हैं। जो सुखों के बीच पले, बढ़े हैं, उनकी चेतना सदा-सदा से सुषुप्ति की ओर अग्रसर होती है। उनके जीवन में भला परिष्कार व पवित्रता का दुर्लभ सौभाग्य कहाँ? यह तो बस केवल उन्हीं को मिलता है, जो पीड़ाओं में पलते हैं और दुःख के दरिया में प्रसन्नतापूर्वक बहते हैं। जो बदनामी के क्षणों में प्रभु भक्ति में जीना और गुमनामी के अँधेरों में प्रभु चिन्तन करते हुए मरना जानते हैं। उन्हें ही परमात्म मिलन का अनन्त सौभाग्य मिलता है।


✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २०८

Friday, January 29, 2021

आध्यात्मिक विकास

 किसी मनुष्य को जो होना चाहिए और वह जो है, उसके बीच में सदा फर्क रहा है। मनुष्य 'जैसा है' को 'जैसा होना चाहिए' के नजदीक लाने का जो प्रयास करता है वही उसका आध्यात्मिक विकास है।

अतः पहला सवाल यह है कि मनुष्य को कैसा होना चाहिए? इसके साथ जुड़ा सवाल यह है कि धरती पर मनुष्य के जीवन का मूल उद्देश्य क्या है? इस उद्देश्य के अनुरूप ही मनुष्य का जीवन होना चाहिए। 


पृथ्वी पर लाखों किस्म के जीव हैं। जीवन लाखों रूप में धरती पर प्रकट हुआ है। पर इन लाखों जीवन रूपों में मनुष्य ही एकमात्र ऐसा जीव है जो नियोजित ढंग से अन्य जीवों की रक्षा के उपाय करने में सक्षम है। इस क्षमता से ही मनुष्य का धरती पर मूल लक्ष्य निर्धारित होता है। 


मनुष्य का मूल उद्देश्य सभी मनुष्यों सहित अन्य सभी जीवों की रक्षा करना है व दुख-दर्द कम करना है। इस तरह मनुष्य की मूल भूमिका रक्षक की है। आज की ही नहीं, आने वाली पीढ़ियों के जीवन की रक्षा के बारे में उसे सोचना है और उसमें यह सामर्थ्य भी है, यह योग्यता भी है। अतः मनुष्य को मूलतः एक रक्षक का जीवन जीना चाहिए। 

क्या ही अच्छा होता यदि इस भूमिका के अनुकूल स्वभाव प्राकृतिक रूप से सभी मनुष्यों को मिल जाता है। यदि ऐसा होता तो सभी मनुष्य रक्षक की भूमिका निभाते और एक दूसरे के दुख-दर्द के सच्चे हितैषी होते। 


इस स्थिति में पृथ्वी पर सभी जीवों को पनपने का भरपूर अवसर मिलता। पर्यावरण की पूरी रक्षा होती व भावी पीढ़ियों के मनुष्यों और अन्य जीवों की जरूरतों का भी पूरा ध्यान रखा जाता। पर अफसोस कि मनुष्य को उसके अनुकूल स्वभाव प्राकृतिक रूप से नहीं मिलता है। यह उसे धीरे-धीरे विकसित करना पड़ता है। अतः अपने जीवन को मनुष्य के मूल उद्देश्य के नजदीक ले जाने का प्रयास करते रहना ही आध्यात्मिक विकास है। 


चाहे यह सफर धीरे-धीरे ही तय हो, चाहे भटकाव के मौके भी आए, चाहे सफलता कम मिले, पर जब तक कोई व्यक्ति सच्ची भावना से मनुष्य के वास्तविक लक्ष्य की ओर बढ़ने का प्रयास कर रहा है तो वह आध्यात्मिक विकास पर अग्रसर है। 


मनुष्य को अपनी जरूरतों के अनुकूल विश्व से ग्रहण करना चाहिए व इससे आगे कोई लालसा नहीं करना चाहिए। यही सादगी का जीवन है। इस सादगी को अपनाए बिना मनुष्य रक्षक की भूमिका नहीं निभा सकता है। 


जब तक उसकी लालसा अपने लिए निरंतर अधिक प्राप्त करने की बनी रहती है, तब तक वह अन्य मनुष्यों व अन्य जीवों का हितैषी नहीं बन सकता क्योंकि वह उसके हिस्सा भी छीनना चाहता है। पर जैसे ही वह सादगी अपनाकर अपनी आवश्यकताओं को समेट लेता है, वैसे ही उसके लिए रक्षक की मूल भूमिका निभाना संभव हो जाता है। इस प्रकार यह प्रयास ही आध्यात्मिक विकास है।


Tuesday, January 19, 2021

खुश रहना है तो जितना है उतने में ही संतोष करो

एक बार की बात है। एक गाँव में एक महान संत रहते थे। वे अपना स्वयं का आश्रम बनाना चाहते थे जिसके लिए वे कई लोगो से मुलाकात करते थे। और उन्हें एक जगह से दूसरी जगह यात्रा के लिए जाना पड़ता था। इसी यात्रा के दौरान एक दिन उनकी मुलाकात एक साधारण सी कन्या विदुषी से हुई। विदुषी ने उनका बड़े हर्ष से स्वागत किया और संत से कुछ समय कुटिया में रुक कर विश्राम करने की याचना की। संत उसके व्यवहार से प्रसन्न हुए और उन्होंने उसका आग्रह स्वीकार किया।


विदुषी ने संत को अपने हाथो से स्वादिष्ट भोज कराया। और उनके विश्राम के लिए खटिया पर एक दरी बिछा दी। और खुद धरती पर टाट बिछा कर सो गई। विदुषी को सोते ही नींद आ गई। उसके चेहरे के भाव से पता चल रहा था कि विदुषी चैन की सुखद नींद ले रही हैं। उधर संत को खटिया पर नींद नहीं आ रही थी। उन्हें मोटे नरम गद्दे की आदत थी जो उन्हें दान में मिला था। वो रात भर चैन की नींद नहीं सो सके और विदुषी के बारे में ही सोचते रहे सोच रहे थे कि वो कैसे इस कठोर जमीन पर इतने चैन से सो सकती हैं।


दूसरे दिन सवेरा होते ही संत ने विदुषी से पूछा कि – तुम कैसे इस कठोर जमीन पर इतने चैन से सो रही थी। तब विदुषी ने बड़ी ही सरलता से उत्तर दिया – हे गुरु देव! मेरे लिए मेरी ये छोटी सी कुटिया एक महल के समान ही भव्य हैं| इसमें मेरे श्रम की महक हैं। अगर मुझे एक समय भी भोजन मिलता हैं तो मैं खुद को भाग्यशाली मानती हूँ। जब दिन भर के कार्यों के बाद मैं इस धरा पर सोती हूँ तो मुझे माँ की गोद का आत्मीय अहसास होता हैं। मैं दिन भर के अपने सत्कर्मो का विचार करते हुए चैन की नींद सो जाती हूँ। मुझे अहसास भी नहीं होता कि मैं इस कठोर धरा पर हूँ।


यह सब सुनकर संत जाने लगे। तब विदुषी ने पूछा – हे गुरुवर! क्या मैं भी आपके साथ आश्रम के लिए धन एकत्र करने चल सकती हूँ ? तब संत ने विनम्रता से उत्तर दिया – बालिका! तुमने जो मुझे आज ज्ञान दिया हैं उससे मुझे पता चला कि मन का सच्चा का सुख कहाँ हैं। अब मुझे किसी आश्रम की इच्छा नहीं रह गई।


यह कहकर संत वापस अपने गाँव लौट गये और एकत्र किया धन उन्होंने गरीबो में बाँट दिया और स्वयं एक कुटिया बनाकर रहने लगे।


जिसके मन में संतोष नहीं है सब्र नहीं हैं वह लाखों करोड़ों की दौलत होते हुए भी खुश नहीं रह सकता। बड़े बड़े महलों, बंगलों में मखमल के गद्दों पर भी उसे चैन की नींद नहीं आ सकती। उसे हमेशा और ज्यादा पाने का मोह लगा रहता है। इसके विपरीत जो अपने पास जितना है उसी में संतुष्ट है, जिसे और ज्यादा पाने का मोह नहीं है वह कम संसाधनों में भी ख़ुशी से रह सकता है।

Wednesday, November 18, 2020

दुनिया रंग बिरंगी

 *एक फोटोग्राफ़र ने दुकान के बाहर बोर्ड लगा रखा था।*

*20 रु. में - आप जैसे हैं, वैसा ही फोटो खिंचवाएँ।*

*30 रु.में - आप जैसा सोचते हैं, वैसा फोटो खिंचवाएँ।*

*50 रु. में - आप जैसा लोगों को दिखाना चाहें,  वैसा फोटो खिंचवाएँ।*


*बाद में उस फोटोग्राफर ने  अपने संस्मरण में लिखा,*

 

*मैंने जीवनभर फोटो खींचे, लेकिन किसी ने भी 20 रु.वाला फोटो नहीं खिंचवाया, सभी ने 50 रु. वाले ही खिंचवाए....*


*दोस्तो, बस कुछ ऐसी ही हक़ीक़त है- ज़िंदगी की...*


*हम  हमेशा दिखावे के लिए ही जीते रहे है, हमने कभी अपनी वो 20 रुपये वाली जिंदगी जी ही नही!!!*


दोस्तों, ये दुनिया भी कितनी निराली है!


*जिसकी आँखों में नींद है ….

उसके पास अच्छा बिस्तर नहीं …

जिसके पास अच्छा बिस्तर है …….

उसकी आँखों में नींद नहीं …*


*जिसके मन में दया है ….

उसके पास किसी को देने के लिए धन नहीं* ….

*और जिसके पास धन है उसके मन में दया नहीं …*


*जिन्हे कद्र है रिश्तों की …

उन से कोई रिश्ता रखना नही चाहता....*

*जिनसे रिश्ता रखना चाहते हैं ….

उन्हें  रिश्तों की कद्र नहीं* 


*जिसको भूख है उसके पास खाने के लिए भोजन नहीं….

* और जिसके पास खाने के लिए भोजन है ………

उसको भूख नहीं…*


*कोई अपनों के लिए….

रोटी छोड़ देता है…तो कोई रोटी के लिए…..

अपनों को….*


*है ना ये दुनिया निराली !!*


         

Monday, November 9, 2020

सबसे बड़ी समस्या


बहुत समय पहले की बात है एक महाज्ञानी पंडित हिमालय की पहाड़ियों में कहीं रहते थे . लोगों के बीच रह कर वह थक चुके थे और अब ईश्वर भक्ति करते हुए एक सादा जीवन व्यतीत करना चाहते थे . लेकिन उनकी प्रसिद्धि इतनी थी की


लोग दुर्गम  पहाड़ियों , सकरे रास्तों , नदी-झरनो को पार कर के भी उससे मिलना चाहते थे , उनका मानना था कि यह विद्वान उनकी हर समस्या का समाधान कर सकता है .


इस बार भी कुछ लोग ढूंढते हुए उसकी कुटिया तक आ पहुंचे . पंडित जी ने उन्हें इंतज़ार करने के लिए कहा .


तीन दिन बीत गए , अब और भी कई लोग वहां पहुँच गए , जब लोगों के लिए जगह कम पड़ने लगी तब पंडित जी बोले ,” आज मैं आप सभी के प्रश्नो का उत्तर दूंगा , पर आपको वचन देना होगा कि यहाँ से जाने के बाद आप किसी और से इस स्थान के  बारे में  नहीं बताएँगे , ताकि आज के बाद मैं एकांत में रह कर अपनी साधना कर सकूँ …..चलिए अपनी -अपनी समस्याएं बताइये “

यह सुनते ही किसी ने अपनी परेशानी बतानी शुरू की , लेकिन वह अभी कुछ शब्द ही बोल पाया था कि बीच में किसी और ने अपनी  बात कहनी शुरू कर दी . सभी जानते थे कि आज के बाद उन्हें कभी पंडित जी से बात करने का मौका नहीं मिलेगा ; इसलिए वे सब जल्दी से जल्दी अपनी बात रखना चाहते थे . कुछ ही देर में वहां का दृश्य मछली -बाज़ार जैसा हो गया और अंततः पंडित जी को चीख कर बोलना पड़ा ,” कृपया शांत हो जाइये ! अपनी -अपनी समस्या एक पर्चे पे लिखकर मुझे दीजिये . “


सभी ने अपनी -अपनी समस्याएं लिखकर आगे बढ़ा दी . पंडित जी ने सारे पर्चे लिए और उन्हें एक टोकरी में डाल कर मिला दिया और बोले , ” इस टोकरी को एक-दूसरे को पास कीजिये , हर व्यक्ति एक पर्ची उठाएगा और उसे पढ़ेगा . उसके बाद उसे निर्णय लेना होगा कि क्या वो अपनी समस्या को इस समस्या से बदलना चाहता है ?”


हर व्यक्ति एक पर्चा उठाता , उसे पढता और सहम सा जाता . एक -एक कर के सभी ने पर्चियां देख ली पर कोई भी अपनी समस्या के बदले किसी और की समस्या लेने को तैयार नहीं हुआ; सबका यही सोचना था कि उनकी अपनी समस्या चाहे कितनी ही बड़ी क्यों न हो बाकी लोगों की समस्या जितनी गंभीर नहीं है . दो घंटे बाद सभी अपनी-अपनी पर्ची हाथ में लिए लौटने लगे , वे खुश थे कि उनकी समस्या उतनी बड़ी भी नहीं है जितना कि वे सोचते थे .


मित्रों, ऐसा कौन होगा जिसके जीवन में एक भी समस्या न हो ? हम सभी के जीवन में समस्याएं हैं , कोई अपनी तबियत से परेशान है तो कोई दूसरों को मिल रही सुख संपत्ति से …हमें इस बात को स्वीकार करना चाहिए कि जीवन है तो छोटी -बड़ी समस्याएं आती ही रहेंगी , ऐसे में दुखी हो कर उसी के बारे में सोचने से अच्छा है कि हम अपना ध्यान उसके निवारण में लगाएं … और अगर उसका कोई समाधान ही न हो तो अन्य उत्पादित चीजों पर प्रकाश डालें… हमें लगता है कि सबसे बड़ी समस्या हमारी ही है पर विश्वास जानिए इस दुनिया में लोगों के पास इतनी बड़ी -बड़ी समस्याएं हैं कि हमारी तो उनके सामने कुछ भी नहीं … इसलिए ईश्वर ने जो भी दिया है उसके लिए ईश्वर के सदैव आभारी रहिये और एक खुशहाल जीवन जीने का प्रयास करिये .


   🌹🙏🏻🚩 *जय सियाराम* 🚩🙏🏻🌹

Friday, October 9, 2020

ग्रहों की शांति के लिए लाभकारी हैं ये पौधे

 


1    ग्रहों की शांति के लिए लाभकारी हैं ये पौधे


आपने कभी सोचा है क‍ि घर के बड़े-बुजुर्ग घर की चारों द‍िशाओं में कोई न कोई पौधा क्‍यों लगाते थे। आपको जानकर हैरानी होगी क‍ि इन पौधों में ग्रह दशाओं को ठीक करने की क्षमता होती है। इसल‍िए बड़े-बुजुर्ग घर की चारों द‍िशाओं में अलग-अलग पौधे लगाते थे। इस आर्टिकल में हम आपको ग्रहों की शांति के लिए घर में लगाए जाने वाले इन पौधों के बारे में जानकारी दे रहे हैं। तो आइए इस व‍िषय पर ऐस्‍ट्रॉलजर प्रमोद पांडेय से व‍िस्‍तार से जानते हैं…


2    बृहस्‍पत‍ि का दोष

अगर कुंडली में बृहस्‍पत‍ि दोष हो तो घर के पिछले हिस्से में केले का पेड़ लगाएं। यह पौधा बृहस्पति देवता का स्वरुप होता है। इसल‍िए केले का पौधा लगाने से कुंडली में व्‍याप्‍त बृहस्‍पत‍ि का दोष भी समाप्‍त हो जाता है। साथ ही धन संबंधी परेशानियों से भी राहत मिलती है।


3    चंद्र दोष


अगर कुंडली में चंद्र दोष हो तो घर के बीचों-बीच आंगन में हरसिंगार का पौधा लगाना चाह‍िए। इस पौधे को घर के बीचों-बीच या पिछले हिस्से में लगाने से आर्थिक संपन्नता प्राप्त होती है। लेक‍िन इसकी देखभाल में लापरवाही न बरतें क्‍योंक‍ि इस पौधे के सूख जाने से मन-मस्तिष्‍क पर नकारात्‍मक प्रभाव पड़ता है।


4.       शुक्र ग्रह दोष


अगर कुंडली में शुक्र दोष हो तो घर के आंगन में तुलसी का पौधा लगाएं। ऐसा करने से घर से नकारात्मक उर्जा दूर हो जाती है और सकारात्‍मक ऊर्जा का संचार होता है। साथ ही घर-पर‍िवार के सभी सदस्‍यों के जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है। ध्‍यान रखें जिनका शुक्र ग्रह कमजोर है उन्हें न‍ियम‍ित रूप से शाम को तुलसी के आगे दीप प्रज्वलित करना चाहिए।


5.          राहु-केतु दोष


अगर कुंडली में राहु-केतु का दोष हो तो घर में अनार का पौधा लगाना चाह‍िए। इससे राहु-केतु के नकारात्मक प्रभाव को कम होता है। वास्तुशास्‍त्र के अनुसार घर के सामने अनार का पेड़ लगाना शुभता लेकर आता है। इसके अलावा अगर न‍ियम‍ित रूप से प्रत्‍येक सोमवार को अनार के फूल को शहद में डुबोकर भगवान शिव को समर्पित क‍िया जाए तो इससे बड़ी से बड़ी मुश्किल आसानी से दूर हो जाती है।


6    शनि दोष


अगर कुंडली में शनि दोष हो तो घर में शमी का पेड़ लगाना चाह‍िए। मान्यता है कि शमी में सभी देवताओं का वास होता है और इस पेड़ का संबंध शनि महाराज से भी है। इसल‍िए वास्‍तुशास्‍त्र के अनुसार शमी के पौधे को घर के मुख्य द्वार के बायीं ओर लगाना चाह‍िए। साथ ही नियमित रूप से शमी के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं। इससे शनिदेव की कृपा बनी रहेगी और ब‍िगड़ते कार्य भी बनने लगते हैं।


7.       बुध, शनि एवम बृहस्पति ग्रहों का दोष


अगर कुंडली में बुध, शनि और बृहस्पति ग्रह का दोष हो तो पीपल लगाना चाह‍िए। मान्‍यता है क‍ि पीपल की नियमित पूजा करने, जल चढ़ाने और परिक्रमा करने से संतान दोष नष्ट होता है और बीमारियों से निजात मिलता है। लेक‍िन ध्‍यान रखें क‍ि पीपल का बोनसाई पेड़ घर के पिछले हिस्से में लगाएं तो यह उन्नति एवं लोगों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में सहायक होता है।


8    सूर्य और मंगल का दोष


अगर कुंडली में सूर्य और मंगल का दोष हो तो घर में गुड़हल का पौधा लगाना चाह‍िए। यह पौधा सूर्य और मंगल ग्रह से जुड़ा हुआ है। मान्‍यता है क‍ि मंगल ग्रह को प्रसन्न करने के लिए पवनसुत को गुड़हल का फूल अर्पित करें। साथ ही सूर्यदेव को जल अर्पित करते समय उसमें गुड़हल का फूल डालकर अर्घ्‍य दें। ऐसा करने से जातक को अत्‍यंत लाभ होता है और वास्‍तुदोष भी दूर होता है। गुड़हल का पौधा घर में कहीं भी लगा सकते हैं। यह अत्‍यंत लाभकारी होता है।


नवभारतटाइम्स.कॉम अक्टूबर 09, 2020

Saturday, October 3, 2020

त्याग का रहस्य: अखंड ज्योति फरवरी 1943

 एक बार महर्षि नारद ज्ञान का प्रचार करते हुए किसी सघन बन में जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक बहुत बड़ा घनी छाया वाला सेमर का वृक्ष देखा और उसकी छाया में विश्राम करने के लिए ठहर गये।


नारदजी को उसकी शीतल छाया में आराम करके बड़ा आनन्द हुआ, वे उसके वैभव की भूरि भूरि प्रशंसा करने लगे। 


उन्होंने उससे पूछा कि.. “वृक्ष राज तुम्हारा इतना बड़ा वैभव किस प्रकार सुस्थिर रहता है ? पवन तुम्हें गिराती क्यों नहीं?” 


सेमर के वृक्ष ने हंसते हुए ऋषि के प्रश्न का उत्तर दिया कि- “भगवान् ! बेचारे पवन की कोई सामर्थ्य नहीं कि वह मेरा बाल भी बाँका कर सके। वह मुझे किसी प्रकार गिरा नहीं सकता।” 


नारदजी को लगा कि सेमर का वृक्ष अभिमान के नशे में ऐसे वचन बोल रहा है। उन्हें यह उचित प्रतीत न हुआ और झुँझलाते हुए सुरलोक को चले गये।


सुरपुर में जाकर नारदजी ने पवन से कहा, ‘अमुक वृक्ष अभिमान पूर्वक दर्प वचन बोलता हुआ आपकी निन्दा करता है, सो उसका अभिमान दूर करना चाहिए।‘ 


पवन को अपनी निन्दा करने वाले पर बहुत क्रोध आया और वह उस वृक्ष को उखाड़ फेंकने के लिए बड़े प्रबल प्रवाह के साथ आँधी तूफान की तरह चल दिया।


सेमर का वृक्ष बड़ा तपस्वी परोपकारी और ज्ञानी था, उसे भावी संकट की पूर्व सूचना मिल गई। वृक्ष ने अपने बचने का उपाय तुरन्त ही कर लिया। उसने अपने सारे पत्ते झाड़ डाले और ठूंठ की तरह खड़ा हो गया। पवन आया उसने बहुत प्रयत्न किया पर ढूँठ का कुछ भी बिगाड़ न सका। अन्ततः उसे निराश होकर लौट जाना पड़ा।


कुछ दिन पश्चात् नारदजी उस वृक्ष का परिणाम देखने के लिए उसी बन में फिर पहुँचे । पर वहाँ उन्होंने देखा कि वृक्ष ज्यों का त्यों हरा भरा खड़ा है। नारदजी को इस पर बड़ा आश्चर्य हुआ। 


उन्होंने सेमर से पूछा- “पवन ने सारी शक्ति के साथ तुम्हें उखाड़ने की चेष्टा की थी पर तुम तो अभी तक ज्यों के त्यों खड़े हुए हो, इसका क्या रहस्य है?”


वृक्ष ने नारदजी को प्रणाम किया और नम्रता पूर्वक निवेदन किया- “ऋषिराज ! मेरे पास इतना वैभव है पर मैं इसके मोह में बँधा हुआ नहीं हूँ। संसार की सेवा के लिए इतने पत्तों को धारण किये हुए हूँ, परन्तु जब जरूरत समझता हूँ इस सारे वैभव को बिना किसी हिचकिचाहट के त्याग देता हूँ और ठूँठ बन जाता हूँ। मुझे वैभव का गर्व नहीं था वरन् अपने ठूँठ होने का अभिमान था इसीलिए मैंने पवन की अपेक्षा अपनी सामर्थ्य को अधिक बताया था। आप देख रहे हैं कि उसी निर्लिप्त कर्मयोग के कारण मैं पवन की प्रचंड टक्कर सहता हुआ भी यथा पूर्व खड़ा हुआ हूँ।“


नारदजी समझ गये कि संसार में वैभव रखना, धनवान होना कोई बुरी बात नहीं है। इससे तो बहुत से शुभ कार्य हो सकते हैं। बुराई तो धन के अभिमान में डूब जाने और उससे मोह करने में है। यदि कोई व्यक्ति धनी होते हुए भी मन से पवित्र रहे तो वह एक प्रकार का साधु ही है। ऐसे जल में कमल की तरह निर्लिप्त रहने वाले कर्मयोगी साधु के लिए घर ही तपोभूमि है।


‘अखण्ड ज्योति, फरवरी-1943’

Saturday, September 12, 2020

प्राणों के नाम, स्थान और कार्य

हमारा शरीर जिस तत्व के कारण जीवित है, उसका नाम ‘प्राण’ है। शरीर में हाथ-पाँव आदि कर्मेन्द्रियां, नेत्र-श्रोत्र आदि ज्ञानेंद्रियाँ तथा अन्य सब अवयव-अंग इस प्राण से ही शक्ति पाकर समस्त कार्यों को करते है। प्राण से ही भोजन का पाचन, रस, रक्त, माँस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य, रज, ओज आदि सभी धातुओं का निर्माण होता है तथा व्यर्थ पदार्थों का शरीर से बाहर निकलना, उठना, बैठना, चलना, बोलना, चिंतन-मनन-स्मरण-ध्यान आदि समस्त स्थूल व सूक्ष्म क्रियाएँ होती है। प्राण की न्यूनता-निर्बलता होने पर शरीर के अवयव शिथिल व मृतप्राय हो जाते है। प्राण के बलवान होने पर समस्त शरीर के अवयवों में बल, पराक्रम आते है और पुरुषार्थ, साहस, उत्साह, धैर्य, आशा, प्रसन्नता, तप, क्षमा, आदि की प्रवृत्ति होती है।

शरीर के बलवान व निरोग होने पर ही भौतिक व आध्यात्मिक (spiritual) लक्ष्यों की प्राप्ति की जा सकती है। इसलिए हमें प्राणों की रक्षा करनी चाहिए अर्थात शुद्ध आहार, प्रगाढ़ निद्रा, ब्रह्मचर्य, प्राणायाम (pranayama) आदि के माध्यम से शरीर को प्राणवान बनाना चाहिए। ईश्वर (omnipresent god) इस प्राण को जीवात्मा (soul) के उपयोग के लिए प्रदान करता है। जैसे ही जीवात्मा किसी शरीर में प्रवेश करता है प्राण भी उसके साथ शरीर में प्रवेश करता है और जीवात्मा के शरीर में से निकलते ही शरीर से प्राण भी निकाल जाता है।

मुख्यत: प्राण 5 बताए गए हैं- 

प्राण, 

अपान, 

समान, 

उदान और 

व्यान। 

                        मुख्य प्राण


१. प्राण – इसका स्थान नासिका से हृदय(heart) तक है। नेत्र, श्रोत्र, मुख आदि अवयव इसी के सहयोग से कार्य करते है। यह सभी प्राणों का राजा है। जैसे राजा अपने अधिकारियों को विभिन्न स्थानों पर विभिन्न कार्यों के लिए नियुक्त करता है, वैसे ही यह भी अन्य प्राणों को विभिन्न स्थानों पर विभिन्न कार्यों के लिए नियुक्त करता है।


२. अपान – इसका स्थान नाभि से पाँव तक है। यह गुदा इंद्रिय द्वारा मल व वायु तथा मूत्रेन्द्रिय द्वारा मूत्र व वीर्य को तथा योनि द्वारा रज व गर्भ को शरीर से बाहर निकालने का कार्य करता है।


३. समान – इसका स्थान हृदय से नाभि तक है। यह खाए हुए अन्न को पचाने तथा पचे हुए अन्न से रस, रक्त आदि धातुओं को बनाने का कार्य करता है।


४. उदान – यह कण्ठ से शिर (मस्तिष्क) तक के अवयवों में रहता है। शब्दों का उच्चारण, वमन आदि के अतिरिक्त यह अच्छे कर्म करने वाली जीवात्मा को उत्तम योनि में व बुरे कर्म करने वाली जीवात्मा को बुरे लोक (सूअर, कुत्ते आदि की योनि) में तथा जिस मनुष्य के पाप-पुण्य बराबर हो, उसे मनुष्य लोक(मनुष्य योनि) में ले जाता है।


५. व्यान – यह सम्पूर्ण शरीर में रहता है। हृदय से मुख्य १०१ नाड़ियाँ निकलती हैं, प्रत्येक नाड़ी की १००-१०० शाखाएँ है तथा प्रत्येक शाखा की भी ७२००० उपशाखाएँ है। इस प्रकार कुल ७२७२१०२०१ नाड़ी शाखा-उपशाखाओं में यह रहता है। समस्त शरीर में रक्त संचार, प्राण-संचार का कार्य यही करता है तथा अन्य प्राणों को उनके कार्यों में सहयोग भी देता है।


उपप्राण

उपप्राण भी 5 ही बताए हैं-

 नाग,

 कूर्म, 

कृकल, 

देवदत्त और 

धनंजय।


१. नाग – यह कण्ठ से मुख तक रहता है। डकार, हिचकी आदि कर्म इसी के द्वारा होते है।


२. कूर्म – इसका स्थान मुख्य रूप से नेत्र गोलक है। यह नेत्र गोलकों में रहता हुआ उन्हें दाएँ-बाएँ, ऊपर-नीचे घुमाने की तथा पलकों को खोलने बंद करने की क्रिया करता है। आँसू भी इसी के सहयोग से निकलते है।


३. कृकल – यह मुख से हृदय तक के स्थान में रहता है तथा जंभाई, भूख, प्यास आदि को उत्पन्न करने का कार्य करता है।


४. देवदत्त – यह नासिका से कण्ठ तक के स्थान में रहता है। इसका कार्य छींक, आलस्य, तन्द्रा, निद्रा आदि को लाने का है।


५. धनंजय – यह सम्पूर्ण शरीर में व्यापक है। इसका कार्य शरीर के अवयवों को खींचे रखना, माँसपेशियों (muscles) को सुंदर बनाना आदि है। शरीर में से जीवात्मा के निकल जाने पर यह भी निकल जाता है, फलत: इस प्राण के अभाव में शरीर फूल जाता है।

Friday, September 4, 2020

मन्दिर दर्शन एवं परम्परा

हम मंदिर जाते हैं भगवान के रूप का दर्शन करने के लिए । लेकिन वहां जाकर आँखें बन्द करके याद करते हैं कि भगवान से क्या क्या मांगा जाए ? कुछ लोग वहां आंखें बंद करके खड़े रहते हैं। आंखें बंद क्यों करना, हम तो दर्शन करने आए हैं। 


मंदिर में भगवान का दर्शन सदैव खुली आंखों से करना चाहिए, निहारना चाहिए। भगवान के स्वरूप का, श्री चरणों का, मुखारविंद का, श्रृंगार का संपूर्ण आनंद लें, आंखों में भर ले निज-स्वरूप को।

दर्शन के बाद जब बाहर आकर बैठें, तब नेत्र बंद करके जो दर्शन किया हैं उस स्वरूप का ध्यान करें। मंदिर से बाहर आने के बाद, पैड़ी पर बैठ कर स्वयं की आत्मा का ध्यान करें तब नेत्र बंद करें और अगर निज आत्मस्वरूप ध्यान में भगवान नहीं आए तो दोबारा मंदिर में जाएं और पुन: दर्शन करें।

प्रश्न~ मंदिर में दर्शन के बाद बाहर सीढ़ी पर थोड़ी देर क्यों बैठा जाता है ?

उत्तर ~ यह प्राचीन परंपरा एक विशेष उद्देश्य के लिए बनाई गई है। वास्तव में मंदिर की पैड़ी पर बैठ कर एक श्लोक बोलना चाहिए। यह श्लोक आजकल के लोग भूल गए हैं। इस श्लोक को मनन करें और आने वाली पीढ़ी को भी बताएं।
श्लोक इस प्रकार है ~
         
   *अनायासेन मरणम् ,*
            *बिना देन्येन जीवनम्।*
            *देहान्त तव सानिध्यम् ,*
            *देहि मे परमेश्वरम्॥*

    इस श्लोक का अर्थ है ~
  *अनायासेन मरणम्* अर्थात् बिना तकलीफ के हमारी मृत्यु हो और कभी भी बीमार होकर बिस्तर पर न पड़ें, कष्ट उठाकर मृत्यु को प्राप्त ना हों चलते फिरते ही हमारे प्राण निकल जाएं।

 *बिना देन्येन जीवनम्* अर्थात् परवशता का जीवन ना हो। कभी किसी के सहारे ना रहाना पड़े। जैसे कि लकवा हो जाने पर व्यक्ति दूसरे पर आश्रित हो जाता है वैसे परवश या बेबस ना हों। 

 *देहांते तव सानिध्यम* अर्थात् जब भी मृत्यु हो तब भगवान के सम्मुख हो। जैसे भीष्म पितामह की मृत्यु के समय स्वयं  (कृष्ण जी) उनके सम्मुख जाकर खड़े हो गए। उनके दर्शन करते हुए प्राण निकले।

 *देहि में परमेशवरम्* हे परमेश्वर ऐसा वरदान हमें देना।

    भगवान से प्रार्थना करते हुऐ उपरोक्त श्र्लोक का पाठ करें। गाड़ी, लड़का, लड़की, पति, पत्नी, घर, धन इत्यादि (अर्थात् संसार) नहीं मांगना है, यह तो भगवान आप की पात्रता के हिसाब से खुद आपको देते हैं। इसीलिए दर्शन करने के बाद बैठकर यह प्रार्थना अवश्य करनी चाहिए। यह प्रार्थना है, याचना नहीं है। याचना सांसारिक पदार्थों के लिए होती है। जैसे कि घर, व्यापार,नौकरी, पुत्र, पुत्री, सांसारिक सुख, धन या अन्य बातों के लिए जो मांग की जाती है वह याचना है ।

     *'प्रार्थना' शब्द के 'प्र' का अर्थ होता है 'विशेष' अर्थात् विशिष्ट, श्रेष्ठ और 'अर्थना' अर्थात् निवेदन। प्रार्थना का अर्थ हुआ विशेष निवेदन।*

*॥ सत्यम परम् धीमहि ॥* 

पंं विष्णु शास्त्री

Sunday, August 30, 2020

प्रार्थना

असली प्रार्थना वह है जो तुम्हें बदलती है। प्रार्थना करने में तुम बदलते हो। तुम्हारी प्रार्थना ही अगर तुम्हारे हृदय तक पहुंच जाए, सुन लो तुम तो रूपांतरण हो जाता है….

प्रार्थना का प्रयोजन ही प्रभु तक पहुंचने में नहीं है। प्रार्थना तुम्हारे हृदय का भाव है। फूल खिले सुगंध किसी के नासापुटों तक पहुंचती है, यह बात प्रयोजन की नहीं है। प्रार्थना तुम्हारी फूल की गंध की तरह होनी चाहिए। तुमने निवेदन कर दिया, तुम्हारा आनंद निवेदन करने में ही होना चाहिए। इससे ज्यादा का मतलब है कि कुछ मांग छिपी हुई है भीतर। तुम कुछ मांग रहे हो। जब तुमने मांगा, प्रार्थना को मार डाला, गला घोंट दिया, प्रार्थना तो प्रार्थना ही तभी है, जब उसमें कोई वासना नहीं है। वासना से मुक्त होने के कारण ही प्रार्थना है। वही तो उसकी पावनता है। तुमने अगर प्रार्थना में कुछ वासना रखी, कुछ भी परमात्मा को पाने की ही सही तो तुम्हारा अहंकार बोल रहा है। अहंकार की बोली प्रार्थना नहीं है। अंहकार के तो बोल ही नहीं। प्रार्थना आनंद है। कोयल ने कुहू-कुहू का गीत गाया, मोर नाचा, नदी का कलकल नाद है,फूलों की गंध है, सूरज की किरणें हैं, कहीं कोई प्रयोजन नहीं है,आनंद की अभिव्यक्ति है,ऐसी तुम्हारी प्रार्थना हो। तुम्हें इतना दिया है परमात्मा ने, प्रार्थना तुम्हारा धन्यवाद होना चाहिए-तुम्हारी कृतज्ञता। लेकिन प्रार्थना तुम्हारी मांग होती है। तुम यह नहीं कहने जाते मंदिर कि हे प्रभु , इतना तूने दिया, धन्यवाद! कि मैं अपात्र, और मुझे इतना भर दिया! मेरी कोई योग्यता नहीं, और तू औघड़दानी और तूने इतना दिया। मैंने कुछ भी अर्जित नहीं किया, और तू दिए चला जाता है, तेरे दान का अंत नहीं है। धन्यवाद देने जब तुम मंदिर जाते हो तब प्रार्थना। पहुंची या नहीं पहुंची यह सवाल नहीं है। तुमने कुछ मांगा, तो उसका अर्थ हुआ कि तुम परमात्मा को बदलने गए। उसका इरादा मेरे अनुसार चलना चाहिए। यह प्रार्थना हुई? तुम परमात्मा को अपने से ज्यादा समझदार समझ रहे हो? तुम सलाह दे रहे हो? यह अपमान हुआ। यह नास्तिकता है, आस्तिकता नहीं है। आस्तिक तो कहता है तेरी मर्जी ही ठीक है। मेरी मर्जी सुनना ही मत। क्योंकि मेरी सुनी तो भूल हो जाएगी। तू जो करे वो ठीक है। ठीक की और कोई परिभाषा नहीं है। प्रार्थना तुम्हारा सहज आनंदभाव । प्रार्थना साधन नहीं ,साध्य। प्रार्थना अपने में पर्याप्त,अपने में पूरी, परिपूर्ण। नाचो, गाओ, आह्लाद प्रकट करो, उत्सव मनाओ। बस वही आनंद है। वही आनंद तुम्हें रूपांतरित करेगा। वही आनंद रसायन है। उसी आनंद में लिप्त होते-होते तुम पाओगे-अरे परमात्मा तक पहुंचे या नहीं, इससे क्या प्रयोजन है? मैं बदल गया! मैं नया हो आया! प्रार्थना स्नान है आत्मा का। उससे तुम शुद्ध होओगे, तुम निखरोगे। और एक दिन तुम पाओगे कि प्रार्थना निखरती गई, एक दिन अचानक चौंक कर पाओगे कि तुम ही परमात्मा हो। जब तक यह जान न लिया जाए कि मैं परमात्मा हूं तब तक कुछ भी नहीं जाना-या जो जाना सब आसार है।

Monday, August 17, 2020

असली खुशी पाने में नहीं देने में है

व्हाट्सएप पर प्राप्त किसी महिला का संस्मरण:
सच्ची घटना पर आधारित यह बात कुछ दिनों पुरानी है जब स्कूल बस की हड़ताल चल रही थी। मेरे मिस्टर अपने व्यवसाय की एक आवश्यक मीटिंग में बिजी थे इसलिए मेरे 5 साल के बेटे को स्कूल से लाने के लिए मुझे टू-व्हीलर पर जाना पड़ा। 
जब मैं टू व्हीलर से घर की ओर वापस आ रही थी, तब अचानक रास्ते में मेरा बैलेंस बिगड़ा और मैं एवं मेरा बेटा हम दोनों गाड़ी सहित नीचे गिर गए। मेरे शरीर पर कई खरोंच आए लेकिन प्रभु की कृपा से मेरे बेटे को कहीं खरोच तक नहीं आई ।
हमें नीचे गिरा देखकर आसपास के कुछ लोग इकट्ठे हो गए और उन्होंने हमारी मदद करना चाही। तभी मेरी कामवाली बाई राधा ने मुझे दूर से ही देख लिया और वह दौड़ी चली आई ।उसने मुझे सहारा देकर खड़ा किया, और अपने एक परिचित से मेरी गाड़ी एक दुकान पर खड़ी करवा दी।
वह मुझे कंधे का सहारा देकर अपने घर ले गई जो पास में ही था। जैसे ही हम घर पहुंचे वैसे ही राधा के दोनों बच्चे हमारे पास आ गए। राधा ने अपने पल्लू से बंधा हुआ 50 का नोट निकाला और अपने बेटे राजू को दूध ,बैंडेज एवं एंटीसेप्टिक क्रीम लेने के लिए भेजा तथा अपनी बेटी रानी को पानी गर्म करने का बोला। उसने मुझे कुर्सी पर बिठाया तथा मटके का ठंडा जल पिलाया। इतने मे पानी गर्म हो गया था। वह मुझे लेकर बाथरूम में गई और वहां पर उसने मेरे सारे जख्मों को गर्म पानी से अच्छी तरह से धोकर साफ किए और बाद में वह उठकर बाहर गई वहां से वह एक नया टावेल और एक नया गाउन मेरे लिए लेकर आई। उसने टावेल से मेरा पूरा बदन पोंछ तथा जहां आवश्यक था वहां बैंडेज लगाई। साथ ही जहां मामूली चोट पर एंटीसेप्टिक क्रीम लगाया।
अब मुझे कुछ राहत महसूस हो रही थी।
उसने मुझे पहनने के लिए नया गाउन दिया वह बोली "यह गाउन मैंने कुछ दिन पहले ही खरीदा था लेकिन आज तक नहीं पहना मैडम आप यही पहन लीजिए तथा थोड़ी देर आप रेस्ट कर लीजिए। "
"आपके कपड़े बहुत गंदे हो रहे हैं हम इन्हें धो कर सुखा देंगे फिर आप अपने कपड़े बदल लेना।" मेरे पास कोई चॉइस नहीं थी मैं गाउन पहनकर बाथरुम से बाहर आई। उसने झटपट अलमारी में से एक नया चद्दर निकाल और पलंग पर बिछाकर बोली आप थोड़ी देर यहीं आराम कीजिए।
इतने मैं बिटिया ने दूध भी गर्म कर दिया था।
राधा ने दूध में दो चम्मच हल्दी मिलाई और मुझे पीने को दिया और बड़े विश्वास से कहा मैडम आप यह दूध पी लीजिए आपके सारे जख्म भर जाएंगे।
लेकिन अब मेरा ध्यान तन पर था ही नहीं बल्कि मेरे अपने मन पर था। मेरे मन के सारे जख्म एक एक कर के हरे हो रहे थे।।मैं सोच रही थी "कहां मैं और कहां यह राधा?" जिस राधा को मैं फटे पुराने कपड़े देती थी, उसने आज मुझे नया टावेल दिया, नया गाउन दिया और मेरे लिए नई बेडशीट लगाई। धन्य है यह राधा।
एक तरफ मेरे दिमाग में यह सब चल चल रहा था तब दूसरी तरफ राधा गरम गरम चपाती और भिंडी की सब्जी बना रही थी। थोड़ी देर मे वह थाली लगाकर ले आई। वह बोली "आप और बेटा दोनों खाना खा लीजिए।" राधा को मालूम था कि मेरा बेटा भिंडी की सब्जी ही पसंद करता है और उसे गरम गरम रोटी चाहिए।
इसलिए उसने रानी से तैयार करवा दी थी।
रानी बड़े प्यार से मेरे बेटे को भिंडी की सब्जी और रोटी खिला रही थी और मैं इधर प्रायश्चित की आग में जल रही थी, सोच रही थी कि जब भी इसका बेटा राजू मेरे घर आता था मैं उसे एक तरफ बिठा देती थी, उसको नफरत से देखती थी और इन लोगों के मन में हमारे प्रति कितना प्रेम है ।
यह सब सोच सोच कर मैं आत्मग्लानि से भरी जा रही थी। मेरा मन दुख और पश्चाताप से भर गया था।
तभी मेरी नज़र राजू के पैरों पर गई जो लंगड़ा कर चल रहा था मैंने राधा से पूछा "राधा इसके पैर को क्या हो गया तुमने इलाज नहीं करवाया ?" राधा ने बड़े दुख भरे शब्दों में कहा मैडम इसके पैर का ऑपरेशन करवाना है जिसका खर्च करीबन ₹ 10000 रुपए है। मैंने और राजू के पापा ने रात दिन मेहनत कर के ₹5000 तो जोड़ लिए हैं ₹5000 की और आवश्यकता है। हमने बहुत कोशिश की लेकिन कहीं से मिल नहीं सके, ठीक है भगवान का भरोसा है जब आएंगे तब इलाज हो जाएगा। फिर हम लोग कर ही क्या सकते हैं? तभी मुझे ख्याल आया कि राधा ने एक बार मुझसे ₹5000 अग्रिम मांगे थे और मैंने बहाना बनाकर मना कर दिया था।
आज वही राधा अपने पल्लू में बंधे सारे रुपए हम पर खर्च कर के खुश थी और हम उसको, पैसे होते हुए भी मुकर गए थे और सोच रहे थे कि बला टली।
आज मुझे पता चला कि उस वक्त इन लोगों को पैसों की कितनी सख्त आवश्यकता थी।
मैं अपनी ही नजरों में गिरती ही चली जा रही थी। अब मुझे अपने शारीरिक जख्मों की चिंता बिल्कुल नहीं थी बल्कि उन जख्मों की चिंता थी जो मेरी आत्मा को मैंने ही लगाए थे। मैंने दृढ़ निश्चय किया कि जो हुआ सो हुआ लेकिन आगे जो होगा वह सर्वश्रेष्ठ ही होगा।
मैंने उसी वक्त राधा के घर में जिन जिन चीजों का अभाव था उसकी एक लिस्ट अपने दिमाग में तैयार की। थोड़ी देर में मैं लगभग ठीक हो गई। मैंने अपने कपड़े चेंज किए। लेकिन वह गाउन मैंने अपने पास ही रखा और राधा को बोला "यह गाऊन अब तुम्हें कभी भी नहीं दूंगी यह गाऊन मेरी जिंदगी का सबसे अमूल्य तोहफा है।"
राधा बोली मैडम यह तो बहुत हल्की रेंज का है। राधा की बात का मेरे पास कोई जवाब नहीं था। मैं घर आ गई लेकिन रात भर सो नहीं पाई मैंने अपनी सहेली के मिस्टर, जो की हड्डी रोग विशेषज्ञ थे, उनसे राजू के लिए अगले दिन का अपॉइंटमेंट लिया। दूसरे दिन मेरी किटी पार्टी भी थी । लेकिन मैंने वह पार्टी कैंसिल कर दी और राधा की जरूरत का सारा सामान खरीदा। 
और वह सामान लेकर में राधा के घर पहुंच गई।
राधा समझ ही नहीं पा रही थी कि इतना सारा सामान एक साथ में उसके घर मै क्यों लेकर गई। मैंने धीरे से उसको पास में बिठाया और बोला मुझे मैडम मत कहो मुझे अपनी बहन ही समझो यह सारा सामान मैं तुम्हारे लिए नहीं लाई हूं मेरे इन दोनों प्यारे बच्चों के लिए लाई हूं और हां मैंने राजू के लिए एक अच्छे डॉक्टर से अपॉइंटमेंट ले लिया है अपन को शाम 7:00 बजे उसको दिखाने चलना है उसका ऑपरेशन जल्द से जल्द करवा लेंगे और तब राजू भी अच्छी तरह से दोड़ने लग जाएगा। राधा यह बात सुनकर खुशी के मारे रो पड़ी लेकिन यह भी कहती रही कि "मैडम यह सब आप क्यों कर रहे हो?" हम बहुत छोटे लोग हैं हमारे यहां तो यह सब चलता ही रहता है। वह मेरे पैरों में गिरने लगी। यह सब सुनकर और देखकर मेरा मन भी द्रवित हो उठा और मेरी आंखों से भी आंसू के झरने फूट पड़े। मैंने उसको दोनों हाथों से ऊपर उठाया और गले लगा लिया मैंने बोला बहन रोने की जरूरत नहीं है अब इस घर की सारी जवाबदारी मेरी है। मैंने मन ही मन कहा राधा तुम क्या जानती हो कि मैं कितनी छोटी हूं और तुम कितने बड़ी हो आज तुम लोगों के कारण मेरी आंखे खुल सकीं। मेरे पास इतना सब कुछ होते हुए भी मैं भगवान से और अधिक की भीख मांगती रही मैंने कभी संतोष का अनुभव नहीं किया।
लेकिन आज मैंने जाना के असली खुशी पाने में नहीं देने में है ।
मैं परमपिता परमेश्वर को बार-बार धन्यवाद दे रही थी, कि आज उन्होंने मेरी आंखें खोल दी। मेरे पास जो कुछ था वह बहुत अधिक था उसके लिए मैंने परमात्मा को बार-बार अपने ऊपर उपकार माना तथा उस धन को जरूरतमंद लोगों के बीच खर्च करने का पक्का निर्णय किया।
  1. ( यह कहानी व्हाट्सएप पर किसी के व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित है लेकिन दिल को छू लेने वाली है )

Saturday, March 7, 2020

शनि प्रदोष व्रत, जानें महत्व और पूजा विधि

शनि की साढ़े साती और ढैया है तो ज़रूर करें ये छोटा सा उपाय

प्रदोष व्रत भगवान शंकर और माता पार्वती से जुड़ा एक बेहद ही शुभ व्रत होता है। इस व्रत के बारे में लोगों के बीच ऐसी मान्यता है कि जो कोई भी इंसान पूरी श्रद्धा से इस व्रत को करता है और पूरे विधि-विधान से भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करता है उसपर भगवान शिव का आशीर्वाद हमेशा बना रहता है। हर महीने की कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को ये व्रत रखा जाता है ।

जानकारी के लिए बता दें कि अगर शनि प्रदोष व्रत पुष्य नक्षत्र में पड़ता है तो ज्योतिषीय दृष्टि से इसका धार्मिक महत्व कई गुना बढ़ जाता है। 

इसके पीछे का तर्क यह है कि नक्षत्र के स्वामी का दर्जा शनिदेव को दिया गया है। ऐसे में इस संयोग को बेहद दुर्लभ माना जा रहा है। वैसे तो प्रदोष और पुष्य नक्षत्र दोनों ही प्रत्येक महीने में आते हैं, लेकिन शनिवार को प्रदोष व्रत का पड़ना और इसी दिन पुष्य नक्षत्र और सौभाग्य योग का संयोग पड़ना सालों-साल में एक बार बनने वाला योग है जो इस वर्ष 7 मार्च 2020, को पड़ रहा है। 

प्रदोष व्रत महत्व और पूजन विधि 

स्कंदपुराण में इस व्रत के बारे में ज़िक्र करते हुए लिखा गया है कि इस व्रत को किसी भी उम्र का कोई इंसान रख सकता है और इस व्रत को दो तरह से रखे जाने का प्रावधान है। कुछ लोग इस व्रत को सूर्योदय के साथ ही सुबह  से शुरू कर के सूर्यास्त तक रखते हैं और शाम को भगवान शिव की पूजा के बाद शाम को अपना व्रत खोल लेते हैं, तो वहीं कुछ लोग इस दिन 24 घंटे व्रत को रखते हैं और रात में जगराता करके भगवान शिव की पूजा करते हैं और अगले दिन ही व्रत खोलते हैं। 

इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान कर लेना चाहिए।
इसके बाद पूरी एकाग्रता से भगवान शिव और माता पार्वती का पूजन करना चाहिए और व्रत का संकल्प लेना चाहिए।

इस दिन का व्रत निर्जला रखा जाता है।

इस दिन पूजा में बेलपत्र, गंगाजल, अक्षत, धूप इत्यादि ज़रूर शामिल करना चाहिए।

शाम के समय स्नानादि करके भगवान शिव का पूजन करें।

इस दिन दशरथकृत शनि स्त्रोत का पाठ भी किये जाने का विशेष महत्व बताया गया है।

इसके अलावा इस दिन शनि चालीसा और शिव चालीसा का पाठ भी करना चाहिए। शाम की पूजा के बाद अन्न-जल ग्रहण किया जा सकता है।

प्रदोष व्रत से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें 

पौराणिक कथाओं के अनुसार त्रयोदशी के दिन महादेव और माता पार्वती अपने भक्तों की सभी मनोकामना को अवश्य पूरा करते हैं। इस व्रत को बेहद कल्याणकारी माना गया है, साथ ही इस व्रत के प्रभाव से मिलने वाले फल को भी बेहद ख़ास माना जाता है। जानिए इस व्रत से जुड़ी कुछ और बेहद ही ख़ास बातें,

जब प्रदोष व्रत सोमवार को पड़ता है तब उसे सोम प्रदोषम या चंद्र प्रदोषम कहते हैं। किसी भी तरह की मनोकामना पूरी करवानी हो या निरोगी रहने की अभिलाषा हो तो सोमवार का प्रदोष व्रत रखना चाहिए।

जब प्रदोष व्रत मंगलवार को पड़ता है तब उसे भौम प्रदोष कहते हैं। अगर कोई इंसान लंबे समय से बीमार चल रहा हो और उसे इस परेशानी से छुटकारा चाहिए हो तो उन्हें मंगलवार के दिन त्रयोदशी का प्रदोष व्रत रखने की सलाह दी जाती है।

जब प्रदोष व्रत बुधवार को पड़ता है तब उसे बुध प्रदोष या सौम्यवारा प्रदोष कहते हैं। इच्छा पूर्ति के लिए बुधवार को पड़ने वाला प्रदोष व्रत रखने की सलाह दी जाती है।


जब प्रदोष व्रत गुरुवार/बृहस्पतिवार को पड़ता है तब उसे गुरु प्रदोषम कहते हैं। शत्रुओं से मुक्ति पाने के लिए और जीवन की कोई भी बाधा दूर करने के लिए गुरुवार का प्रदोष व्रत रखना बेहद उपयुक्त माना जाता है। 

जब प्रदोष व्रत शुक्रवार को पड़ता है तब उसे शुक्र प्रदोषम कहते हैं। सुहागनों के लिए शुक्रवार को पड़ने वाले प्रदोष व्रत को रखने की सलाह दी जाती है। मान्यता है कि इस दिन व्रत और पूजा करने से उन्हें सौभाग्य की प्राप्ति होती है और उनका दांपत्य जीवन हमेशा ख़ुशियों से भरा रहता है।

जब प्रदोष व्रत शनिवार को पड़ता है तब उसे शनि प्रदोषम कहते हैं। जिन्हें संतान प्राप्ति की कामना होती है उनके लिए शनिवार के प्रदोष व्रत का सुझाव दिया जाता है। इस दिन व्रत-उपवास रखने से भगवान आपकी मनोकामना अवश्य सुनते हैं।

इसलिए भी बेहद ख़ास माना जाता है शनि प्रदोष व्रत 
भगवान शिव को शनिदेव के गुरु का दर्ज़ा प्राप्त है। ऐसे में शनि से संबंधी कोई भी दोष के निवारण के लिए शनि प्रदोष का व्रत बेहद उपयुक्त माना गया है। इस व्रत के बारे में लोगों की ऐसी मान्यता भी है कि ये व्रत इंसान के जीवन पर शनि के प्रकोप, शनि की ढैया, शनि की साढ़ेसाती का भी प्रकोप काफी कम कर देता है। 

इसके अलावा शनिवार को पड़ने वाला प्रदोष व्रत संपूर्ण धन-धान्य दिलाने वाला और समस्त दुखों से छुटकारा देने वाला होता है। इस दिन व्रत और विधि विधान से पूजा करने पर जीवन में शनि से होने वाले दुष्प्रभावों से बचा जा सकता है। 

प्रदोष व्रत मुख्यतः भगवान शिव के लिए रखा जाता है लेकिन शनिवार के दिन पड़ने की वजह से इस दिन शनिदेव की भी पूजा का प्रावधान है। शनिवार के दिन पड़ने की वजह से इसे शनि प्रदोष व्रत भी कहा जाता है। 

इस व्रत को बेहद ख़ास माना जाता है और कहा जाता है कि जो भी इंसान पूरी श्रद्धा से इस दिन व्रत और पूजा करता है उसपर भगवान शिव और शनिदेव की कृपा अवश्य प्राप्त होती है। शनि प्रदोष का व्रत उन्हें भी रखने की सलाह दी जाती है जिनकी शादी में कोई दिक्कत आ रही हो या जिन्हें संतान सुख की इच्छा हो।

जब प्रदोष व्रत रविवार को पड़ता है तब उसे भानु प्रदोष या रवि प्रदोषम कहते हैं। अगर अच्छे स्वास्थ्य और लंबी आयु की कामना है तो आपको रविवार का प्रदोष व्रत रखना चाहिए। 

आयुषी चतुर्वेदी