Tuesday, August 25, 2015

व्यक्ति और उसका जीवन ही शक्ति का स्रोत है

* वीरता से आगे बढो़। एक दिन या एक साल में सिद्धि की आशा न रखो। उच्चतम आदर्श पर दृढ़ एवं स्थिर रहो। स्वार्थपरता और ईर्ष्या से बचो। आज्ञा पालन करो। सत्य, मनुष्य जाति और अपने देश के पक्ष पर सदा के लिए अटल रहो और तुम संसार को हिला दोगे। याद रखो- व्यक्ति और उसका जीवन ही शक्ति का स्रोत है, इसके सिवाय अन्य कुछ भी नहीं।

* सभी मरेंगे ही, यही संसार का नियम है। साधु हो या असाधु, धनी हो या दरिद्र सभी मरेंगे। चिरकाल तक किसी का शरीर नहीं रहेगा। अतएव उठो, जागो और संपूर्ण रूप से निष्कपट हो जाओ। भारत में घोर कपट समा गया है। चाहिए चरित्र, चाहिए दृढ़ता और चरित्र का बल, जिससे मनुष्य आजीवन दृढ़व्रत बन सके।

* मन और मुंह को एक करके भावों को जीवन में कार्यान्वित करना होगा। इसी को श्रीरामकृष्ण कहा करते थे- भाव के घर में किसी प्रकार की चोरी न होने पाए। सब विषयों में व्यावहारिक बनना होगा। लोगों या समाज की बातों पर ध्यान न देकर वे एकाग्र मन से अपना कार्य करते रहेंगे। क्या तुमने नहीं सुने हैं कबीरदास के दोहे- 'हाथी चले बाजार में, कुत्ता भौंके हजार साधुन को दुर्भाव नहिं, जो निंदे संसार' ऐसे ही हमें भी निरंतर चलना है। दुनिया के लोगों की बातों पर ध्यान नहीं देना होगा। उनकी भली-बुरी बातों को सुनने से जीवन भर कोई किसी प्रकार का महत् कार्य नहीं कर सकता।

* प्रत्येक कार्य में अपनी समस्त शक्ति का प्रयोग करो। पहले स्वयं संपूर्ण मुक्तावस्था प्राप्त कर लो, उसके बाद इच्छा करने पर फिर अपने को सीमाबद्ध कर सकते हो।

* मैं चाहता हूं कि मेरे सब बच्चे, मैं जितना उन्नत बन सकता था, उससे सौगुना उन्नत बनें। तुम लोगों में से प्रत्येक को महान शक्तिशाली बनना होगा। मैं कहता हूं- अवश्य बनना होगा। आज्ञा-पालन, ध्येय के प्रति अनुराग तथा ध्येय को कार्यरूप में परिणत करने के लिए सदा प्रस्तुत रहना। इन तीनों के रहने पर कोई भी तुम्हे अपने मार्ग से विचलित नहीं कर सकता।

* जो पवित्र तथा साहसी है, वही जगत् में सब कुछ कर सकता है। माया-मोह से प्रभु सदा तुम्हारी रक्षा करें। मैं तुम्हारे साथ काम करने के लिए सदैव प्रस्तुत हूं एवं हम लोग यदि स्वयं अपने मित्र रहें तो प्रभु भी हमारे लिए सैकड़ों मित्र भेजेंगे।

* आओ हम नाम, यश और दूसरों पर शासन करने की इच्छा से रहित होकर काम करें। काम, क्रोध एंव लोभ इस त्रिविध बंधन से हम मुक्त हो जाएं और फिर सत्य हमारे साथ रहेगा।

* न टालो, न ढूंढों! भगवान अपनी इच्छानुसार जो कुछ भेजें, उसके लिए प्रतिक्षा करते रहो, यही मेरा मूलमंत्र है।

* बिना पाखंडी और कायर बने सबको प्रसन्न रखो। पवित्रता और शक्ति के साथ अपने आदर्श पर दृढ रहो और फिर तुम्हारे सामने कैसी भी बाधाएं क्यों न हों, कुछ समय बाद संसार तुमको मानेगा ही।

* धीरज रखो और मृत्युपर्यंत विश्वासपात्र रहो। आपस में न लडो! रुपए-पैसे के व्यवहार में शुध्द भाव रखो। हम अभी महान कार्य करेंगे। जब तक तुममें ईमानदारी, भक्ति और विश्वास है, तब तक प्रत्येक कार्य में तुम्हे सफलता मिलेगी।

बिल्वपत्र

जानिए बिल्वपत्र के बारे में महत्वपूर्ण बातें

भगवान शिव के पूजन में बिल्वपत्र का बहुत महत्व है। कहा जाता है, कि बिल्वपत्र शि‍वजी को अतिप्रिय है। इसलिए भोलेनाथ को बि‍ल्वपत्र अर्पित किया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं बिल्वपत्र के बारे में  महत्वपूर्ण बातें ? यदि नहीं जानते, तो जरूर पढ़िए -


1  बिल्वपत्र 6 महीने तक बासी नहीं माना जाता। इसे एक बार शिवलिंग पर चढ़ाने के बाद धोकर पुन: चढ़ाया जा सकता है। कई जगह शिवालयों में बिल्वपत्र उपलब्ध नहीं हो पाने पर इसके चूर्ण को चढ़ाने का विधान भी है।

2.   बिल्वपत्र को औषधि‍ के रूप में भी प्रयोग किया जाता है। इसमें निहित इगेलिन व इगेलेनिन नामक क्षार-तत्व औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं। यह चातुर्मास में उत्पन्न होने वाली विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं से भी निजात दिलाता है ।

3  यह गैस, कफ और अपचन की समस्या को दूर करने में सक्षम है। इसके अलावा यह कृमि और दुर्गंध की समस्या में भी फायदेमंद है । प्रतिदिन 7 बिल्वपत्र खाकर पानी पीने से स्वप्नदोष की बीमारी से छुटकारा मिलता है। इसी प्रकार यह एक औषधि के रूप में भी काम आता है।

4  मधुमेह के रोगियों के लिए बिल्वपत्र रामबाण इलाज है। मधुमेह होने पर 5 बिल्वपत्र, 5 कालीमिर्च के साथ प्रतिदिन सुबह के समय खाने से अत्यधि‍क लाभ होता है। बिल्वपत्र के प्रतिदिन सेवन से गर्मी बढ़ने की समस्या भी समाप्त हो जाती है।
5  शिवलिंग पर प्रतिदिन बिल्वपत्र चढ़ाने से सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं भक्त को कभी भी पैसों की समस्या नहीं रहती है। बिल्वपत्र को तिजोरी में रखने से भी बरकत आती है।

6  कुछ विशेष तिथि‍यों पर बि‍ल्वपत्र को तोड़ना वर्जित होता है। चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, द्वादशी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा, संक्रांति पर बिल्वपत्र को नहीं तोड़ना चाहिए।

7  सोमवार के दिन बिल्वपत्र को नहीं तोड़ना चाहिए, इसमें शि‍वजी का वास माना जाता है। इसके अलावा प्रतिदिन दोपहर के बाद भी बिल्वपत्र नहीं तोड़ना चाहिए।

Sunday, August 23, 2015

100 वर्ष जिंदा रहने के 5 उपाय

पहले के लोग निरोगी रहकर 100 वर्ष से भी ज्यादा ‍जिंदा रहकर जिंदगी का लुफ्त उठा लेते थे, लेकिन आजकल का व्यक्ति तो 60 के बाद धक्के खाने लगता है और मुश्किल से ही 80 पार कर पाता है। शोध से पता चला है कि अच्छी और सक्रिय जीवनशैली का फायदा उम्र के किसी भी पड़ाव में मिल सकता है।

हालांकि आज भी ऐसे कई लोग हैं जो अपनी उम्र का शतक लगाकर ढेर सारे अनुभव और शांति अपने साथ ले जाते हैं और ऐसे ही लोग को प्रकृति पूर्ण जीवन के लिए पुन: गर्भ उपलब्ध करा देती है। प्रकृति का चक्र पूरा करना बेहद जरूरी है। कोई फल बगैर पके वृक्ष से नीचे गिर गया है तो उसे नीचे भी वही प्रक्रिया पूर्ण करना होगी या फिर वह दुर्गति का शिकार होगा और नए जीवन के लिए भटकता रहेगा। तो जानते हैं सौ वर्ष जिंदा रहने के पांच राज....

अच्छा भोजन :
अच्छा भोजन चयन करना जरूरी है। ज्यादा मिर्च और तेल का भोजन नहीं करना चाहिए। बेसन और मैदे से बने आइटम तो त्याग ही देना चाहिए। किसी भी प्रकार का नशा नहीं करना चाहिए। सम्यक आहार लेला चाहिए अर्थात न ज्यादा और न कम।

भोजन करते वक्त जितनी भूख है उससे दो रोटी कम खाएं। भोजन में सलाद का ज्यादा प्रयोग करें। भोजन बैठकर (पालथी मारकर) ही करें। भोजन करते वक्त मन प्रसन्नचित्त रखें। ऐसा भोजन न करें, जिससे दांतों और आंतों को अतिरिक्त श्रम करना पड़े। भोजन करने के एक घंटे बाद ही पानी पीएं। यह भी ध्यान रखें क‍ि थाली में हाथ न धोएं। रात्रि का भोजन बहुत कम ही करें।

कहते हैं कि खान-पान में मात्रा जानने वाले, संभोग में नियम पालने वाले और अन्य बातों और इंद्रियों में संयम और सम्यकता समझने वाले को जब आंधी आती है तो सिर्फ छूकर चली जाती है, इससे विपरीत उक्त बातों का पालन न करने वाले को जड़ सहित उखाड़कर फेंक देती है।

जल-वायु :
धरती की जलवायु अच्छी होगी तो धरती पर सेहतमंद होगी उसी तरह हमारे शरीर के भीतर की जल वायु का शुद्ध और तरोताजा होना जरूरी है। प्रदूषित जल और वायु से जहां भोजन खराब होता है वहीं इससे गंभीर रोगों का खतरा भी बढ़ जाता है।

जल :
पानी (जल) पीएं छानकर। ध्यान रहे पानी हलका और मीठा पीएं। जब प्यास लगे तब पानी पीएं। पानी बैठकर ही पीएं। पानी गिलास से पीएं या फिर हाथों की अंजुली बनाकर ही पीएं। ऊपर से मुंह में पानी डालकर पीने के अपने नुकसान हैं। जिस पात्र में पानी भरा जाता है व पात्र ईशान कोण में रखा हो, उसके आसपास की जगह साफ हो।

वायु :
भोजन कुछ दिन न मिले तो जीवन चल जाएगा। पानी कुछ घंटे न मिले तो भी चल जाएगा, लेकिन हवा हमें हर पल चाहिए। जिस तरह दूषित भोजन और पानी स्वत: ही निकल जाते हैं या कभी-कभार निकालने का प्रयास करते हैं, उसी तरह शरीर के फेफड़ों और पेट में एकत्रित दूषित वायु को निकालने का प्रयास ‍करें। हलके प्रेशर से सांस बाहर फेंक दें, फिर पूरी गहराई से सांस भीतर खींचें, भ्रस्त्रिका और कपालभाति के इस हिस्से को जब भी समय मिले करते रहें। छींक आए तो पूरी ताकत से छींकें।

शहरी प्रदूषण के कारण शरीर में दूषित वायु के होने की स्थिति में भी उम्र क्षीण होती है और रोगों की उत्पत्ति होती है। पेट में पड़ा भोजन दूषित हो जाता है, जल भी दूषित हो जाता है तो फिर वायु क्यों नहीं। यदि आप लगातार दूषित वायु ही ग्रहण कर रहे हैं तो समझो कि समय से पहले ही रोग और मौत के निकट जा रहे हैं।

नींद :
नींद एक डॉक्टर है और दवा भी। आपकी नींद कैसी होगी, यह निर्भर करता है इस पर क‍ि आप दिनभर किस तरह से जीएं। जरूरी है कार्य, विचार, आहार और व्यवहार पर गंभीर मंथन करना। यदि यह संतुलित और सम्यक रहेगा तो भरपूर ‍नींद से स्वास्थ्‍य में लाभ मिलेगा। यह भी ध्यान रखें क‍ि ज्यादा या कम नींद से सेहत और मन पर विपरीत असर पड़ता है। अच्छे स्वप्नों के लिए अच्छी दिनचर्या को मैनेज करें। इससे स्वास्थ्य अच्छा रहेगा।

झपकी ध्यान :
यदि अत्यधिक कार्य के कारण आपकी नींद पूरी नहीं हो रही है तो सिर्फ एक मिनट का झपकी ध्यान करें। ऑफिस या घर में जब भी लगे तो 60 सेकंड की झपकी मार ही लें। इसमें साँसों के आवागमन को तल्लीनता से महसूस करें। गहरी-गहरी सांस लें। यह न सोचें क‍ि कोई देख लेगा तो क्या सोचेगा। हां आफिस में इसे सतर्कता से करें, वरना बॉस गलत समझ बैठेंगे। इस ध्यान से आप स्वयं को हर वक्त तरोताजा महसूस करेंगे।
मन और मस्तिष्क : मानसिक द्वंद्व, चिंता, दुख: या दिमागी बहस हमारी श्वासों की गति को अनियंत्रित करते हैं, जिससे खून की गति भी असंतुलित हो जाती है। इसका सीधा असर हृदय, फेफड़े और पेट पर होता है और यह गंभीर रोग का कारण भी बन सकता है। मानसिक द्वंद्व या दुख हामारी उम्र घटाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

सुख-दुख से परे मन और मस्तिष्क को शांत और प्रसन्न चित्त रखने के लिए आप सुबह और शाम को 10 मिनट का ध्यान करें। ध्यान करना जरूरी है। ध्‍यान से मस्तिष्क और मन को अतिरिक्त ऊर्जा मिलती है और इसके नियमित अभ्यास से किसी भी प्रकार की समस्या और दुख से व्यक्ति मुक्त हो जाता है।

मौन :
मौन से मन की आंतरिक्त शक्ति और रोगों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। कुछ क्षण ऐसे होते हैं जबकि हम खुद-ब-खुद मौन हो जाते हैं। ऐसा कुछ विशेष परिस्थिति में होता है, लेकिन मौन रहने का प्रयास करना और यह सोचते हुए क‍ि मौन में कम से कम सोचने का प्रयास करूंगा, ज्यादा से ज्यादा देखने और श्‍वासों के आवागमन को महसूस करने का प्रयास करूंगा, एक बेहतर शुरुआत होगी। दो घंटे की व्यर्थ की बहस से 10 मिनट का मौन रिफ्रेश कर विजन पावर बढ़ाएंगा।

नियमित व्यायाम :
वैज्ञानिकों का कहना है कि 70 साल का कोई व्यक्ति यदि नियमित व्यायाम करता है, तो इस बात की पूरी संभावना है कि वह 100 वर्ष की उम्र तक जिए।

आर्काइव्स ऑफ इंटरनल मेडिसिन में प्रकाशित शोध के परिणाम कहते हैं कि लंबी उम्र के लिए हमारे जीन सिर्फ 30 प्रतिशत तक जिम्मेदार होते हैं बाकी का काम तो जीवन शैली करती है।

इसलिए आप योगासन या हल्की-फुल्की कसरत करें और इस बता को अच्छी तरह से तय कर लें कि किसी भी कीमत में पेट और कमर की चर्बी न बढ़ने पाएं।

Wednesday, November 13, 2013

वर्ल्ड डायबीटीज डे


गुरुवार को वर्ल्ड डायबीटीज डे है और यह दिन आपको अपनी जीवनशैली के बारे में अलर्ट करने के मकसद से मनाया जाता है।
मोटे तौर पर समझने की कोशिश करें तो डायबीटीज हॉर्मोंस के असंतुलन, मोटापा और अस्वस्थ जीवनशैली का एक मिला-जुला नतीजा है। इन कारणों से भोजन से मिला कार्बोहाइड्रेट, जिसे हमारी कोशिकाओं में जाकर ऊर्जा देने का काम करना चाहिए, खून में ही घूमता रहता है। इससे खून में शुगर की मात्रा तो जरूरत से ज्यादा मिलती ही है, शरीर के सभी अंगों की नसों पर भी प्रभाव पड़ने लगता है।

डायबीटीज के टाइप
टाइप 1 डायबीटीज
यह बचपन में या किशोर अवस्था में अचानक इंसुलिन के उत्पादन की कमी होने से पैदा होने वाली बीमारी है। इसमें इंसुलिन हॉर्मोन बनना पूरी तरह बंद हो जाता है। ऐसा किसी एंटीबॉडी की वजह से बीटा सेल्स के पूरी तरह काम करना बंद करने से होता है। ऐसे में शरीर में ग्लूकोज की बढ़ी हुई मात्रा को कंट्रोल करने के लिए इंसुलिन के इंजेक्शन की जरूरत होती है। इसके मरीज काफी कम होते हैं।

टाइप 2 डायबीटीज
आमतौर पर 30 साल की उम्र के बाद यह धीरे-धीरे बढ़ता है। इससे प्रभावित ज्यादातर लोगों का वजन सामान्य से ज्यादा होता है या उन्हें पेट के मोटापे की समस्या होती है। यह कई बार आनुवांशिक होता है तो कई मामलों में खराब जीवनशैली से संबंधित होता है। इसमें इंसुलिन कम मात्रा में बनता है या पेंक्रियाज सही से काम नहीं कर रहा होता है। डायबीटीज के 90 फीसदी मरीज इसी कैटिगरी में आते हैं। एक्सरसाइज, बैलेंस्ड डाइट और दवाइयों से इसे कंट्रोल में रखा जा सकता है।

कौन-कौन से टेस्ट
ब्लड टेस्ट
अगर ब्लड शुगर 170 से ज्यादा नहीं है तो पेशाब में नहीं आएगी, इसलिए ब्लड टेस्ट जरूरी है। ब्लड टेस्ट दो बार किया जाता है - खाली पेट और नाश्ता या ग्लूकोज लेने के बाद।
ध्यान रखें :
1. इस टेस्ट से तीन-चार दिन पहले से कार्बोहाइड्रेट से भरपूर खाना खाना चाहिए।
2. टेस्ट से पहले कॉलेस्ट्रॉल कम करनेवाली नाइसिन टैब्लेट, विटामिन-सी, ऐस्प्रिन, गर्भ-निरोधक दवाइयां आदि का बिल्कुल इस्तेमाल न करें। इनसे पेशाब में शुगर लेवल कम आ सकता है, जिससे सही रीडिंग नहीं आ पाएगी।
3. जिस व्यक्ति को 75 ग्राम ग्लूकोज खाकर दो घंटे बाद टेस्ट देना है, उसे कहीं नहीं जाना चाहिए बल्कि वहीं ठहरना चाहिए। एक-डेढ़ घंटे घूम आएं, ऐसा नहीं करना चाहिए। इससे टेस्ट के रिजल्ट पर असर पड़ता है।

डायबीटीज के मरीज हैं तो इन टेस्टों को कराते रहें :

- खाली पेट ब्लड शुगर (नॉर्मल रेंज 100-120) और खाने के 2 घंटे बाद (नॉर्मल रेंज 130-160) हफ्ते में कम-से-कम एक बार
- एचबीए1सी टेस्ट हर तीन से चार महीने बाद कराएं। इस टेस्ट में आपको खाली पेट और खाने के दो घंटे बाद का ब्लड सैंपल देने का झंझट पालने की जरूरत नहीं है। कभी भी, किसी भी लैब में जाकर एचबीए1सी (ग्लाइकोसिलेटेड हीमोग्लोबिन) टेस्ट के लिए सैंपल दे सकते हैं।

- यह टेस्ट सिर्फ डायबीटीज के मरीज ही नहीं, बल्कि सामान्य और प्री-डायबीटिक लोग भी करा सकते हैं। एचबीए1सी से सही समय पर डायबीटीज की सही स्थिति का पता लगाया जा सकता है। इससे ऐसे बिना डायबीटीज वाले मरीजों के मामले में कन्फ्यूजन भी खत्म हो जाता है जिनका इमरजेंसी में किए गए टेस्ट में ब्लड ग्लूकोज लेवल ज्यादा आया हो।

-इस टेस्ट से पिछले तीन महीने की ऐवरेज स्थिति का पता लग जाता है। हीमोग्लोबिन रेड ब्लड सेल्स से बनता है और जब इसमें ग्लूकोज मिलता है तो ग्लाइकोसिलेटेड हीमोग्लोबिन बनता है। एचबीए1सी टेस्ट पिछले तीन महीने का ऐवरेज ब्लड शुगर लेवल बता देता है। इसकी नॉर्मल रेंज 4 से 6 पर्सेंट तक मानी जाती है, लेकिन 5.7 से 6.4 पर्सेंट होने का मतलब है आपकी सेहत के लिए खतरे की घंटी बज चुकी है। यह प्री-डायबीटीज की स्टेज होती है, जो आगे चलकर डायबीटीज में बदल सकती है। डायबीटीज के मरीजों में एचबीए1सी 6.5 से 7 पर्सेंट तक रहे तो डायबीटीज नियंत्रण में मानी जाती है।

और कौन-सी जांच
खून में कॉलेस्ट्रॉल व चर्बी की मात्रा के लिए लिपिड प्रोफाइल टेस्ट

ईसीजी व टीएमटी टेस्ट आंखों की जांच

वजन का रेकॉर्ड

पैरों की जांच ब्लडप्रेशर की जांच

किडनी का टेस्ट

ये सभी जांच साल में एक बार करा लें।

सभी अंगों पर असर डायबीटीज का असर

किडनी पर कुछ साल बाद ही शुरू हो जाता है। इसे रोकने के लिए ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर दोनों को नॉर्मल रखना चाहिए। ब्लड शुगर के स्तर को नियंत्रण में रखकर आंखों की मोतियाबिंद जैसी बीमारियों से बचा जा सकता है। डायबीटीज के मरीजों में अकसर 65 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते दिल के दौरे की समस्या शुरू हो जाती है। इससे बचने के लिए ग्लूकोज स्तर नियंत्रण में रखने के साथ-साथ ब्लड प्रेशर, कॉलेस्ट्रॉल और तनाव पर नियंत्रण भी जरूरी है।

दूसरी बीमारियां
हार्ट अटैक, स्ट्रोक्स, लकवा, इन्फेक्शन और किडनी फेल्योर
स्किन व आंखों की बीमारियां
पैरों की समस्याएं
दांतों की बीमारियां
पुरुषों में नपुंसकता और महिलाओं में बांझपन
फ्रोजन शोल्डर या कंधे का जाम होना

क्या कहती हैं नई रिसर्च
- डायबीटीज नियंत्रण के लिए जीवन शैली में सुधार किसी भी नई या पुरानी दवाओं से ज्यादा कारगर है।
- अगर आपको दिल के दौरे का ज्यादा खतरा है तो कुछ दवाएं बचाव की जगह नुकसान पहुंचा सकती हैं।
- दिल का दौरा आने के बाद ब्लड शुगर ज्यादा कम रखना भी खतरनाक है। ऐसे में फास्टिंग ब्लड शुगर 120 और खाने के 2 घंटे बाद का ब्लड शुगर लेवल 180 से कम न होने दें।
- नई इंसुलिन पर रिसर्च चल रही है। इसे सूंघकर या टैब्लेट के रूप में लिया जा सकता है। इसके आ जाने के बाद डायबीटीज के मरीजों की जिंदगी बेहद आसान हो जाएगी। लगातार ब्लड शुगर स्तर को मॉनिटर करने के लिए नया मॉनिटरिंग सिस्टम जिसे सीजीएम कहते हैं, इंसुलिन पंप एम अन्य नया डिवाइस है जिससे नियमित रूप से इंसुलिन सीधे शरीर में लिया जा सकता है।

इंसुलिन का इस्तेमाल
कई बार नियमित इंसुलिन की डोज लेने के बावजूद ब्लड शुगर लेवल नियंत्रण से बाहर रहता है। गलतफहमी में लोग इसे बेअसर मान लेते हैं और इंसुलिन का इस्तेमाल ही बंद कर देते हैं। ऐसे में समस्या और गंभीर हो जाती है। इंसुलिन खरीदते वक्त यह सुनिश्चित कर लें कि वह सही है या नहीं। हालांकि इसे देखकर असली-नकली का पता लगाना मुश्किल है। कई बार हम इंसुलिन के रंग से उसके असली-नकली होने का अंदाजा लगा सकते हैं। इस समस्या से बचने के लिए किसी अधिकृत केमिस्ट से ही इसे खरीदें और इसका बिल लें। इसके साथ ही यह भी जांच लें कि इंसुलिन के स्टोरेज में तापमान के मानक का ध्यान रखा गया है या नहीं। इसकी क्वालिटी बरकरार रखने के लिए इसे 8 से 10 डिग्री तापमान पर रखना चाहिए। केमिस्ट की दुकान से घर तक लाने और घर में इसे स्टोर करने में भी तापमान का ध्यान रखना जरूरी है। कई बार लोग इसे स्कूटर पर दूर-दूर से गर्मी में लेकर आते हैं या गाड़ी में इंसुलिन रख लेते हैं। पार्किंग में धूप में गाड़ी खड़ी रहने से इंसुलिन खराब हो जाता है। सही तापमान मेनटेन न होने से भी इंसुलिन का असर कम हो जाता है और इस्तेमाल के बावजूद आपकी समस्या बढ़ती रहती है। डायबीटीज को नियंत्रण में रखने के लिए डॉक्टर की सलाह पर इंसुलिन लेने से हिचकिचाएं नहीं, क्योंकि इसके बिना आपकी समस्या बढ़कर किडनी, लिवर, आंखों और हार्ट जैसे महत्वपूर्ण अंगों को अपनी चपेट में ले सकती है और आपका जीवन मुश्किल में डाल सकती है।

किसे पड़ती है इंसुलिन की जरूरत?
शुगर के वे मरीज, जिनको दिल की बीमारी हो या लकवा का अटैक हो चुका हो, आंखों की बीमारी हो, इन्फेक्शन हो, टीबी हो या ऑपरेशन होनेवाला हो। डायबीटीज से पीड़ित गर्भवती महिलाओं को। जब दवाओं से डायबीटीज कंट्रोल में न आ रहा हो। किसी वजह से मरीज सुबह या शाम को इंजेक्शन लगाना भूल जाता है तो मरीज को दो इंजेक्शन एक साथ कभी भी नहीं लगाने चाहिए। कभी मरीज को लगता है कि आज खाने पर कंट्रोल नहीं हो पाएगा तो वह इंसुलिन की मात्रा बढ़ा सकता है।

इंसुलिन लेने का सही तरीका
- डायबीटीज के मरीज सिरिंज और इंसुलिन की शीशी के बजाय इंसुलिन पेन का इस्तेमाल कर सकते हैं, क्योंकि इसे आसानी से कहीं भी ले जाया जा सकता है।
- इंसुलिन का इंजेक्शन हमेशा खाने से पहले लगाना चाहिए। सुबह नाश्ता करने से और रात में डिनर करने से 15-20 मिनट पहले इंसुलिन का इंजेक्शन लगाना चाहिए। दो इंजेक्शनों के बीच 10-12 घंटों का फासला होना जरूरी है। खाने के एकदम साथ न लगाएं क्योंकि ऐसा करने से ब्लड शुगर लेवल बढ़ सकता है। इंसुलिन को ठंडी और साफ जगह पर रखें।

नियंत्रण के तरीके
आयुर्वेद
नीचे दिए दी गई दवाओं में से किसी एक का सेवन करें:
- महामज्जक वटी दिन में दो बार लें।
- बसंत कुसुमाकर का रस दूध से लें।
- चंदप्रभा वटी पानी से दो बार ले सकते हैं।

योग और प्राणायाम
- कुछ खास योगासन और प्राणायाम ब्लड ग्लूकोज स्तर और ब्लड प्रेशर को कम करने में सहायक हैं, क्योंकि इनसे शारीरिक और मानसिक तनाव कम होता है।

- कपालभांति क्रिया (5-7 मिनट), अग्निसार क्रिया (तीन बार) और उर्ध्वहस्तोतान आसन (तीन बार), पवनमुक्तासन (दो बार), भुजंगासन (दो बार), मंडूकासन (पांच-छह बार), अर्ध मत्स्येंदासन (दो बार), उड्यानबंद (दो-तीन बार), अनुलोम-विलोम प्राणायाम (पांच मिनट) और भस्त्रिका प्रणायाम (दो बार) पैंक्रियाज को एक्टिवेट करते हैं।

- पैरों और आंखों के लिए अलग से सूक्ष्म क्रियाएं करें। उज्जायी प्राणायाम दिल को सेफ रखेगा तो अनुलोम-विलोम याददाश्त के लिए अच्छा है। (इन आसनों को खाली पेट सुबह करें या लंच के चार-पांच घंटे बाद करें।)

क्या खाएं

फल: जामुन बेहद फायदेमंद हैं। आंवला, नीबू, संतरा, टमाटर, पपीता, खरबूजा, तरबूज, नाशपाती आदि खाने चाहिए। अमरूद, स्ट्रॉबेरी, अंजीर, मौसमी, मालटा, सिंघाड़ा भी खा सकते हैं। रोजाना 100-150 ग्राम फ्रूट्स खा सकते हैं लेकिन इन्हें मेन खाने से हटकर लें, ताकि खाने के साथ शुगर न बढ़े।

सब्जियां: मेथी, पालक, करेला, बथुआ, सरसों का साग, सीताफल, ककड़ी, तोरई, टिंडा, शिमला मिर्च, भिंडी, सेम, शलजम, खीरा, ग्वार की फली, चने का साग, सोया का साग, गाजर आदि भी खा सकते हैं। लहसुन ग्लूकोज के लेवल को कम करता है।

फाइबर व ओमेगा थ्री फैटी एसिड ज्यादा हो: ब्राउन व बिना पॉलिश चावल, छिलके वाली दालें, चोकर मिला आटा इस्तेमाल करें। सोयाबीन, साबुत चना, राजमा, लोबिया आदि लें। स्प्राउट्स ले सकते हैं। ब्राउन ब्रेड, ओट, दलिया खाएं। दिन भर में चार-पांच कटोरी सब्जियां कच्ची (सलाद) या पकी खाएं।

जूस: करेला, गाजर, पालक, लौकी, शलजम, पत्ता गोभी आदि का जूस पी सकते हैं। वैसे, फलों का रस ज्यादा नहीं पीना चाहिए क्योंकि इनमें शुगर की मात्रा ज्यादा होती है। आधा गिलास तक दिन में।

नॉन वेज: तंदूरी या उबले मुर्गे का मीट और मछली को उबालकर या भूनकर खा सकते हैं। दिन में एक-दो अंडे खा सकते हैं। हालांकि शाकाहारी खाना ही बेहतर है।

घी-तेल: अलसी, सोयाबीन, सरसों, सूरजमुखी का तेल खाएं। सूरजमुखी और कोर्न ऑइल को सरसों को तेल में मिलाकर भी इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन कुल मिलाकर दिन में फैट 15-20 ग्राम (3-4 चम्मच) से ज्यादा न लें। महीने में आधा लीटर तेल काफी है।

दूध से बनी चीजें: दूध, दही, पनीर लें लेकिन लो फैट रखें। डबल टोंड दूध का इस्तेमाल अच्छा है। दिन में दो-तीन कप चाय पी सकते हैं, लेकिन बिना शुगर वाली। नमकीन लस्सी-छाछ पीएं।

मसाले व अन्य : मेथी, लहसुन व दालचीनी खून में ग्लूकोज लेवल कम करते हैं और गुड कॉलेस्ट्रॉल बढ़ाते हैं। एलोवेरा का जूस व जेल भी फायदेमंद है। ग्रीन टी से शरीर में ग्लूकोज अब्जॉर्ब करने की क्षमता बढ़ती है। (नोट : पांच-छह बार में थोड़ा-थोड़ा कर खाएं। महिलाएं 1500-1600 कैलरी और पुरुष 1700-1800 कैलरी ले सकते हैं।)

किससे करें परहेज
मीठी चीजें: चीनी, गुड़, मिठाई, टॉफी, चॉकलेट, आइसक्रीम आदि। मीठे फल : सेब, केला, चीकू, आम, शहतूत, अंगूर, लीची आदि।

सब्जियां: आलू, अरबी, शकरकंद, कचालू जैसी स्टार्च वाली सब्जियां।

घी-तेल: देसी घी, वनस्पति घी-तेल, नारियल तेल, मक्खन, क्रीम, खोया व पनीर। महीने में आधा किलो से ज्यादा घी या तेल नहीं खाना चाहिए।

दूसरी चीजें: मैदा, चावल, शराब, बीयर आदि। बॉर्नवीटा, हॉरलिक्स, बूस्ट, मॉलटोवा, प्रोटीनेक्स आदि।
मांसाहार: अंडे की जर्दी, कीमा, गुर्दे व लिवर का मीट, बकरे का मीट। अंडे का पीला वाला भाग।
इनमें भी शुगर है: चाय, कॉफी, शेक, जूस आदि में शुगर कंटेंट होता है, इसलिए संयमित प्रयोग करें। पास्ता, वाइट ब्रेड आदि मीठे नहीं होते लेकिन इनमें भी शुगर होती है।

मिथ्स और फैक्ट्स
मिथ: मीठा खाने से होता है डायबीटीज
सच: मीठे से डायबीटीज होने का कोई संबंध नहीं है। इसके लिए वंशानुगत और दूसरे कारण जिम्मेदार होते हैं। हालांकि डायबीटीज हो जाने के बाद मीठा खाने से शुगर अनियंत्रित हो जाती है।

मिथ: अल्कोहल का ब्लड ग्लूकोज लेवल से संबंध नहीं है।
सच: नियमित तौर पर अल्कोहल के इस्तेमाल से शरीर में यूरिक एसिड और ट्राइग्लिसरॉइड बढ़ते हैं। साथ ही शुगर भी अनियंत्रित हो जाता है।

मिथ: डायबीटीज के लिए स्पेशल खाना होता है।
सचः डायबीटीज के लिए कोई स्पेशल खाना नहीं होता बल्कि संतुलित आहार की जरूरत होती है, जिसमें 50-60 पर्सेंट कार्बोहाइड्रेट, 15-20 पर्सेंट प्रोटीन और 20-25 पर्सेंट फैट और दूसरे तत्व शामिल हों।

मिथ: शुगर फ्री खाना है समस्या का हल।
सच: शुगर फ्री का मतलब कैलरी फ्री नहीं है। शुगर फ्री के नाम पर जमकर मिठाइयां खाना नुकसानदेय हो सकता है। इनमें खोया, क्रीम आदि की कैलरी भी शामिल होती हैं, जो शुगर अनियंत्रित कर सकती है।

मिथ: डायबीटीज हो तो फल खाना बंद कर दें।
सच: डायबीटीज में लो ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले फल जरूर खाने चाहिए। इनमें सेब, संतरा, मौसमी, अमरूद और पपीता खाएं। चीकू, केला और अंगूर जैसे फल न लें।

मिथ: ड्राई फ्रूट्स खाने से परहेज करना चाहिए।
सच: बादाम और अखरोट जैसे सूखे मेवों से शरीर में अच्छा यानी एचडीएल कॉलेस्ट्रॉल बढ़ता है जो हार्ट अटैक के खतरे को कम करता है, इसलिए ये चीजें खाएं।

मिथ: डायबीटीज हो तो कम खाना खाएं।
सच: कम खाना खाना सही नहीं है। थोड़ा-थोड़ा, बार-बार खाएं। न तो ज्यादा देर भूखे रहें और न ही एक बार में ढेर सारा खाना खाएं।

मिथ: मोटे लोगों को ही होता है डायबीटीज का खतरा।
सच: डायबीटीज किसी को भी हो सकती है, वह चाहे मोटा हो या पतला।

मिथ: डायबीटीज में खास आहार ही है काफी।
सच: अच्छा आहार वही है जिसमें 40-60 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 20 प्रतिशत प्रोटीन और 30 प्रतिशत या उससे कम वसा है। खाने में शाक-सब्जी व फल की अच्छी मात्रा जरूरी है। खाना नियमित अंतराल पर लें।

मिथ: टाइप 2 डायबीटीज टाइप 1 की तरह खतरनाक नहीं है।
सच: रोकथाम न हो तो डायबीटीज के दोनों रूप समस्याओं को जन्म देते हैं। दोनों मामलों में सही दवा के साथ स्वस्थ जीवनशैली जरूरी है। एक को खतरनाक बता कर दूसरे को कम नहीं आंका जा सकता।

मिथ: डायबीटीज एक उम्र के बाद ही होता है।
सच: अब नवजात और छोटे बच्चों में भी यह समस्या दिखती है। उम्र बढ़ने के साथ टाइप 2 डायबीटीज की शिकायत बढ़ती है।

मिथः डायबीटीज का मरीज एथलीट नहीं हो सकता।
सच: ऐसे लोगों की मिसालें हैं जो डायबीटीज के बावजूद खेल-कूद में एक मकाम हासिल कर चुके हैं, जैसे ओलंपिक गोल्ड मेडलिस्ट तैराक गैरी हॉल, क्रिकेट खिलाड़ी वसीम अकरम।

मिथ: डायबीटीज मरीज महिला को गर्भधारण नहीं करना चाहिए।
सच: मां बनने से परहेज करने की कोई जरूरत नहीं है। एक्सपर्ट की देखरेख में संतुलित जीवनशैली अपनाना जरूरी है। गर्भधारण से पहले, गर्भावस्था के दौरान और आगे भी सही शुगर लेवल मेनटेन रखें।

मिथ: डायबीटीज है तो ब्लड डोनेट नहीं कर सकते।
सच: अमेरिकन रेड क्रॉस के अनुसार डायबीटीज के मरीज एक स्वस्थ इंसान की तरह रक्तदान कर सकते हैं बशर्ते कुछ मानकों को पूरा करते हों।

मिथ: डायबीटीज के मरीज की उम्र कम हो जाती है।
सच: शुगर लेवल सही रखा जाए और जीवनशैली सही हो तो डायबीटीज के मरीज की भी उम्र लंबी हो सकती है।

मिथ: दवा ले रहे हों तो कुछ भी खा सकते हैं।
सचः डायबीटीज के मरीज को खाने में रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट और सैचुरेटेड फैट से परहेज करने की सलाह दी जाती है। नियमित एक्सरसाइज, समय पर आहार और सही दवा जरूरी है।

आर्टिफिशल स्वीटनर का चक्कर
ज्यादातर आर्टिफिशल स्वीटनर के फायदे और नुकसान दोनों होते हैं। इसके बुरे प्रभावों में अनजाने में ज्यादा मात्रा में कैलरी ले लेना, पकी हुई चीजों के टेक्सचर में बदलाव, अलर्जी या कार्सिनोजेनिक असर शामिल है। बाकी साइड इफेक्ट्स में सिरदर्द, घबराहट, मितली, नींद कम आना, याददाश्त कमजोर होना, जोड़ों में दर्द और घबराहट आदि शामिल हैं।
नुकसानदायक: सैक्रीन (Saccharin), ऐसपारटेम (Aspartame) न्यूट्रल : सुक्रालोज (Sucralose), स्टीविया (Stevia)

पैरों की सुरक्षा भी है जरूरी
- रोजाना आइने में पैरों की जांच करें।
- पैरों को साफ रखें, खासतौर से तलवों को।
- नंगे पैर कभी न चलें। मंदिर में या घास पर भी नहीं।
- जूते-चप्पल की रगड़ से अगर त्वचा सख्त पड़ गई हो तो डॉक्टर को दिखाएं।
- धूम्रपान बिल्कुल न करें।
- पैरों की गर्म सिकाई कभी न करें।

बच्चों में बढ़ रहा है खतरा
बच्चों में टाइप 2 डायबीटीज़ के मरीजों की तादाद बढ़ रही है क्योंकि उनमें मोटापा बढ़ रहा है। ऐसे तो डायबीटीज़ के सटीक कारण का पता नहीं है, पर ऑटोइम्यून मिकेनिज्म (इंसुलिन बनाने वाले पैनक्रियाज़ के कुछ हिस्से शरीर के अपने इम्यून सिस्टम से नष्ट हो जाते हैं), को एक कारण माना जाता है। आनुवांशिक और पर्यावरणीय कारण (मसलन सामान्य बीमारी आदि) भी महत्वपूर्ण है। इसके लक्षणों में ज्यादा पेशाब और प्यास लगना। अकसर वजन कम होना, कमजोरी और आलस्य, ज्यादा भूख लगना (कभी-कभी भूख मरना), रात में बिस्तर पर पेशाब जबकि पिछली 'रात में सूखा' रहना आदि शुरुआती लक्षण हैं जो बच्चे को लेकर अस्पताल आने से पहले एक सप्ताह से 6 माह तक माता-पिता को दिखते हैं। टाइप 1 के कुछ मरीजों (लगभग 25 फीसदी) में डायबेटिक कीटोएसीडोसिस (डीकेए) हो सकता है जो गंभीर लक्षण है। इसमें उल्टी, पेट दर्द और डिहाड्रेशन (मुंह, होंठ सूखना, आंख धंसना आदि) शामिल हैं। जानकारी हो तो माता-पिता जल्द लक्षण पकड़ लेते हैं और बच्चे को डीकेए की श्रेणी में जाने से बचा सकते हैं।

मोटापा और डायबीटीज

हमारे बच्चों की जीवनशैली स्वस्थ नहीं है। इसी तरह जंक फूड और नई-नई तकनीकों पर निर्भरता बनी रही, मेहनत पीछे छूटती गई तो नतीजे खतरनाक हो सकते हैं। टाइप 2 डायबीटीज जो पहले बच्चों में नहीं सुना जाता था, आजकल तेजी से बढ़ रहा है। वजन ज्यादा होना या मोटापा इसकी बड़ी वजह हैं। मोटापा इंसुलिन को बेअसर करता है। इससे इंसुलिन शरीर पर सही असर नहीं करता। इसके कुछ मुख्य कारण हैं : तेजी से बदलती जीवनशैली, आहार असंतुलन समेत बहुत ज्यादा कैलरी लेना, चीनी और तैलीय पदार्थों का ज्यादा इस्तेमाल और एक्सरसाइज न करना। भोजन और एक्सरसाइज पर सतर्कता से मोटापा और इसके खतरनाक नतीजों से बचा जा सकता है।